जशपुर भूमि महाघोटाला!
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11 साल पहले बिकी जमीन फिर कैसे बिक गई? खसरा नंबर 1764/2278/6 पर उठे बड़े सवाल, न्यायालय के आदेश के बाद भी नहीं थमा विवाद; अब डीजीपी से FIR और उच्चस्तरीय जांच की मांग
➡️ रविकांत शर्मा
भूमिका : एक खसरा नंबर… और सवालों के घेरे में पूरा सिस्टम
जशपुर। ग्राम सन्ना की खसरा नंबर 1764/2278/6, रकबा 0.29 हेक्टेयर भूमि का विवाद अब पूरे जशपुर जिले में चर्चा का विषय बन गया है। शिकायतकर्ता रविकांत शर्मा का आरोप है कि उन्होंने 11 मई 2015 को विक्रेता रमेश प्रसाद से उक्त भूमि का विधिवत पंजीकृत विक्रय पत्र कराया था। नामांतरण हुआ, ऋण पुस्तिका जारी हुई, लेकिन वर्षों बाद ऑनलाइन रिकॉर्ड की कथित तकनीकी त्रुटि के बाद उसी भूमि की दोबारा रजिस्ट्री होने का आरोप सामने आया।
✅ रजिस्ट्री पेपर रमेश प्रसाद-.pdf
पहला अध्याय : जब जमीन बिक चुकी थी, फिर विवाद कैसे शुरू हुआ?
शिकायतकर्ता के अनुसार वर्ष 2015 में विधिवत रजिस्ट्री के बाद उनका नाम राजस्व अभिलेखों में दर्ज किया गया। ऋण पुस्तिका जारी हुई और भूमि पर उनके अधिकार स्थापित हो गए। लगभग एक दशक तक किसी प्रकार का विवाद सामने नहीं आया।
✅ पावती.pdf
दूसरा अध्याय : ऑनलाइन पोर्टल की तकनीकी चूक या किसी के लिए सुनहरा अवसर?
शिकायतकर्ता का आरोप है कि जब राजस्व अभिलेख भुइयां पोर्टल पर अपडेट किए गए तो तकनीकी त्रुटि के कारण पुराने विक्रेता रमेश प्रसाद का नाम दिखाई देता रहा। यदि कागजी रिकॉर्ड सही थे तो ऑनलाइन रिकॉर्ड अलग क्यों था? यही सवाल पूरे मामले का सबसे बड़ा केंद्र बन गया है।
✅ नामांतरण पंजी.pdf
तीसरा अध्याय : एक जमीन… दो रजिस्ट्री का आरोप
शिकायतकर्ता का आरोप है कि इसी ऑनलाइन रिकॉर्ड का लाभ उठाकर रमेश प्रसाद एवं उनके भतीजे प्रियांशु (रीशु) केशरी के नाम उसी भूमि की दोबारा रजिस्ट्री कराई गई। शिकायतकर्ता का कहना है कि संबंधित व्यक्तियों को पहले से जानकारी थी कि भूमि वर्ष 2015 में विधिवत विक्रय हो चुकी थी। इन आरोपों की सत्यता जांच के बाद ही तय होगी।
✅ रजिस्ट्री पेपर रमेश प्रसाद-.pdf
चौथा अध्याय : न्यायालय ने आदेश दिया, फिर भी क्यों नहीं बदला रिकॉर्ड?
शिकायतकर्ता के अनुसार 16 जून 2026 को तहसीलदार न्यायालय ने उपलब्ध अभिलेखों के आधार पर वैध क्रेता के पक्ष में अभिलेख सुधारने का आदेश पारित किया। उनका आरोप है कि आदेश के बावजूद अपेक्षित सुधार नहीं हुआ और उन्हें लगातार कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़े।
✅ तहसील आदेश कॉपी.pdf (बड़ा फोटो , लाल तीर से आदेश की तारीख और आदेश वाले हिस्से को हाइलाइट)
पाँचवाँ अध्याय : थाना से लेकर डीजीपी तक न्याय की गुहार
स्थानीय स्तर पर समाधान न मिलने का आरोप लगाते हुए शिकायतकर्ता ने थाना सन्ना, एसपी जशपुर, एसडीएम, कलेक्टर और अंततः पुलिस महानिदेशक (DGP) छत्तीसगढ़ को विस्तृत शिकायत भेजी है। उन्होंने शिकायत में नामजद व्यक्तियों की भूमिका की जांच, यदि अपराध बनता हो तो FIR तथा संबंधित अधिकारियों की भूमिका की जांच की मांग की है।
✅ शिकायत डीजीपी.pdf
छठा अध्याय : सवाल सिर्फ जमीन का नहीं, पूरे सिस्टम की विश्वसनीयता का है
यदि वर्ष 2015 की रजिस्ट्री वैध थी… यदि नामांतरण भी हो चुका था… यदि न्यायालय ने भी अभिलेख सुधारने का आदेश दिया…
तो सबसे बड़ा सवाल यही है—
फिर यह पूरा विवाद खड़ा कैसे हुआ?
व्यंग्य : कहीं ऐसा तो नहीं कि अब जमीन का असली मालिक कागज नहीं, पोर्टल तय करेगा?
अगर शिकायत में लगाए गए आरोप सही साबित होते हैं, तो यह मामला सिर्फ एक जमीन का नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का आईना है जहाँ कागज कुछ और कहते हैं, पोर्टल कुछ और दिखाता है और आम नागरिक दोनों के बीच अपनी ही जमीन का सबूत लेकर भटकता रहता है।
सवाल यह है कि आखिर जमीन का मालिक रजिस्ट्री तय करेगी, नामांतरण तय करेगा, न्यायालय का आदेश तय करेगा… या फिर ऑनलाइन पोर्टल की स्क्रीन?
अगर न्यायालय के आदेश के बाद भी रिकॉर्ड समय पर नहीं बदलते, तो आम आदमी के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या सरकारी सिस्टम में ‘अपडेट’ बटन सिर्फ सॉफ्टवेयर के लिए है, न्याय के लिए नहीं?
जनता पूछ रही है…
🔸 जब रमेश प्रसाद भूमि बेच चुके थे तो उसी खसरा नंबर पर फिर विवाद कैसे हुआ?
🔸 यदि नामांतरण हो चुका था तो दूसरी प्रक्रिया कैसे आगे बढ़ी?
🔸 न्यायालय के आदेश के बाद भी रिकॉर्ड क्यों नहीं सुधरे?
🔸 क्या पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच होगी?
🔸 यदि किसी स्तर पर लापरवाही हुई है तो जिम्मेदारी किसकी तय होगी?


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