छाल खदान विस्तार पर विरोध के दावों की अग्निपरीक्षा:जनसुनवाई में महज 15 दिन शेषSECL की विस्तार योजना के खिलाफ ग्रामीणों की लामबंदी, लेकिन स्थानीय जनप्रतिनिधियों और संगठनों की भूमिका अब तक सीमित
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धरमजयगढ़/छाल – दक्षिण पूर्वी कोयला क्षेत्र लिमिटेड (SECL) की छाल खदान विस्तार परियोजना को लेकर क्षेत्र में असंतोष बढ़ता जा रहा है। बताया जा रहा है कि प्रस्तावित पर्यावरणीय जनसुनवाई में अब महज 15 दिन शेष हैं। ऐसे में प्रभावित गांवों के ग्रामीण अपने अधिकारों, जमीन और पर्यावरण की सुरक्षा को लेकर लामबंद होने की तैयारी कर रहे हैं। हालांकि, ग्रामीणों के बीच यह चर्चा भी तेज है कि जिस परियोजना के संभावित प्रभावों को लेकर व्यापक जनचर्चा होनी चाहिए थी, उसके विरोध में स्थानीय जनप्रतिनिधियों, कथित समाजसेवियों और पर्यावरण संरक्षण का दावा करने वाले लोगों की सक्रियता अब तक अपेक्षित स्तर पर दिखाई नहीं दे रही है।
जनसुनवाई करीब, विरोध की आवाज क्यों कमजोर?
ग्रामीणों का कहना है कि खदान विस्तार केवल उत्पादन क्षमता बढ़ाने का विषय नहीं है, बल्कि इसका संबंध जमीन, जलस्रोतों, खेती, जंगल, वन्यजीवों और स्थानीय आबादी के भविष्य से भी जुड़ा है। ऐसे में जनसुनवाई की तारीख नजदीक आने के बावजूद यदि विरोध केवल बैठकों, बयानों और सांकेतिक गतिविधियों तक सीमित रहता है, तो प्रभावित लोगों की वास्तविक चिंताएं प्रभावी ढंग से सामने कैसे आएंगी, यह चिंता का विषय है।
क्षेत्र में यह चर्चा भी है कि पुरुंगा कोल ब्लॉक के मुद्दे पर सक्रिय नजर आने वाले कुछ लोग छाल खदान विस्तार के मामले में वैसी तत्परता क्यों नहीं दिखा रहे हैं, जैसी एक बड़े खनन प्रकल्प के संभावित पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभावों को देखते हुए अपेक्षित है। जरूरत इस बात की है कि वे स्वयं सामने आकर अपनी स्थिति स्पष्ट करें।
क्या छाल में भी दिखेगा पुरुँगा जैसा विरोध ?
छाल क्षेत्र में खनन गतिविधियों का विस्तार स्थानीय लोगों के लिए महज औद्योगिक विकास का विषय नहीं है। ग्रामीणों के मुताबिक, क्षेत्र में पहले से मौजूद पानी, सड़क, स्वास्थ्य, रोजगार, विस्थापन और पुनर्वास से जुड़ी समस्याओं का समाधान अभी भी महत्वपूर्ण चिंता बना हुआ है। ऐसे में खदान विस्तार की प्रक्रिया के साथ यह भी सुनिश्चित किया जाना जरूरी है कि पर्यावरणीय प्रभावों का निष्पक्ष आकलन हो और प्रभावित लोगों की आपत्तियों को महज औपचारिकता बनाकर न टाला जाए।
छाल खदान के पूर्व विस्तार संबंधी पर्यावरणीय रिकॉर्ड में खनन क्षमता बढ़ाने और खदान पट्टा क्षेत्र के विस्तार का उल्लेख मिलता है। इससे यह स्पष्ट है कि परियोजना का प्रभाव केवल उत्पादन तक सीमित नहीं माना जा सकता; भूमि, जल और आसपास के सामाजिक परिवेश पर इसके संभावित प्रभावों की गंभीर समीक्षा आवश्यक है।
विधायक , समाजसेवीयों और जनप्रतिनिधियों से ग्रामीणों को उम्मीद
ग्रामीणों का आरोप है कि कुछ जनप्रतिनिधियों ने विरोध का समर्थन तो जताया है, लेकिन अब तक व्यापक स्तर पर ठोस और निरंतर पहल दिखाई नहीं दी है। उनका कहना है कि यदि वास्तव में ग्रामीणों की जमीन, जंगल और जीवन-यापन की चिंता है, तो जनसुनवाई से पहले प्रभावित गांवों में खुली बैठकें, दस्तावेजों का अध्ययन, पर्यावरणीय रिपोर्ट का स्थानीय भाषा में विश्लेषण और प्रशासन के समक्ष लिखित आपत्तियां दर्ज कराने की पहल होनी चाहिए।
साथ ही, स्वयं को समाजसेवी और पर्यावरण प्रेमी बताने वाले लोगों से भी ग्रामीण यह अपेक्षा कर रहे हैं कि वे केवल प्रतीकात्मक विरोध तक सीमित न रहें, बल्कि पर्यावरणीय प्रभावों, वन्यजीवों की सुरक्षा, जलस्रोतों और विस्थापन से जुड़े मुद्दों पर तथ्य आधारित अभियान चलाएं।
पर्यावरणीय जनसुनवाई प्रभावित लोगों को अपनी आपत्तियां और सुझाव दर्ज कराने का औपचारिक मंच प्रदान करती है। ऐसे में जनसुनवाई के बहिष्कार की रणनीति अपनाने से पहले ग्रामीणों और जनप्रतिनिधियों को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि उनकी आपत्तियां सक्षम प्राधिकारी के समक्ष विधिवत दर्ज हों और उनका रिकॉर्ड तैयार हो। केवल सांकेतिक विरोध से परियोजना के पर्यावरणीय, सामाजिक और आर्थिक प्रभावों पर ठोस जवाबदेही तय करना कठिन हो सकता है।
विकास के साथ जवाबदेही कौन तय करेगा?
छाल खदान विस्तार को लेकर अब बहस केवल विरोध या समर्थन तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। असली मुद्दा यह है कि खनन विस्तार से प्रभावित होने वाले लोगों के अधिकारों, पर्यावरण और वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए क्या ठोस प्रबंध किए गए हैं। यदि परियोजना के संभावित प्रभावों को लेकर गंभीर चिंताएं हैं, तो उनके समाधान के लिए प्रशासन, परियोजना प्रबंधन, जनप्रतिनिधियों और पर्यावरणीय संगठनों को स्पष्ट भूमिका निभानी होगी।
जनसुनवाई में अब बमुश्किल 15 दिन शेष बताए जा रहे हैं। ऐसे में छाल के ग्रामीणों की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि विरोध की आवाज केवल बयानों और सांकेतिक गतिविधियों तक सीमित रहती है या फिर जमीन, जंगल, जल और जनजीवन से जुड़े मुद्दों को लेकर कोई ठोस, संगठित और तथ्य आधारित पहल भी सामने आती है।
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