मांड नदी से पत्थर निकासी पर घमासान: लिखित अनुमति नहीं, फिर किसके आदेश पर चल रहा काम? मल्का पावर परियोजना फिर सवालों के घेरे में !
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धरमजयगढ़ – बहुचर्चित मल्का पावर परियोजना एक बार फिर गंभीर विवादों में घिरती नजर आ रही है। एक ओर परियोजना से जुड़ा विवाद थाना धरमजयगढ़ तक पहुंच चुका है और पुलिस जांच जारी है, वहीं दूसरी ओर मांड नदी से बड़े पैमाने पर पत्थरों की निकासी ने नया बवाल खड़ा कर दिया है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर नदी से पत्थर निकालने और उन्हें भारी वाहनों के जरिए परिवहन करने की अनुमति किस आधार पर दी गई, जबकि परियोजना प्रबंधन स्वयं इस संबंध में कोई लिखित अनुमति दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर पा रहा है।
जानकारी के अनुसार, परियोजना के लिए पूर्व में मांड नदी में आवागमन हेतु एक अस्थायी मार्ग बनाया गया था। स्थानीय लोगों का कहना है कि इस मार्ग के निर्माण में नदी के भीतर बड़े-बड़े पत्थर डाले गए थे और सीमेंट संरचनाओं का भी उपयोग किया गया था। अब उन्हीं पत्थरों को हटाने के नाम पर जेसीबी और अन्य भारी मशीनों की सहायता से नदी से बाहर निकाला जा रहा है तथा हाइवा वाहनों में भरकर परियोजना क्षेत्र की ओर ले जाया जा रहा है।

जानकारी के अनुसार मामले ने तब और गंभीर रूप ले लिया जब परियोजना में जुड़े एक अधिकारी ने स्वीकार किया कि उनके पास पत्थर निकासी से संबंधित कोई औपचारिक अनुमति पत्र उपलब्ध नहीं है। उनका कहना है कि नदी किनारे कटाव की शिकायत के बाद एसडीएम स्तर से मौखिक रूप से पत्थर हटाने की बात कही गई थी। लेकिन सवाल यह है कि क्या किसी नदी क्षेत्र से खनिज प्रकृति की सामग्री निकालने और उसका परिवहन करने जैसा कार्य केवल मौखिक निर्देशों के आधार पर किया जा सकता है?

जिस ग्रामीण परिवार की शिकायत का हवाला दिया जा रहा है, उनके परिजनों ने भी स्पष्ट किया है कि उन्होंने केवल मौखिक शिकायत की थी। ऐसे में पूरे मामले में अनुमति की वैधानिकता पर और भी बड़ा प्रश्नचिह्न लग गया है। यदि कोई लिखित आदेश जारी हुआ है तो वह सार्वजनिक क्यों नहीं किया जा रहा? और यदि ऐसा कोई आदेश नहीं है तो फिर नदी में यह गतिविधि किस अधिकार से संचालित हो रही है?
विशेषज्ञों का मानना है कि नदी क्षेत्र में किसी भी प्रकार की खुदाई, निकासी या खनिज सामग्री के परिवहन के लिए निर्धारित प्रक्रिया के तहत सक्षम प्राधिकारी की लिखित स्वीकृति आवश्यक होती है। ऐसे मामलों में राजस्व, खनिज और पर्यावरणीय नियमों का पालन भी अनिवार्य माना जाता है।

उल्लेखनीय है कि इसी परियोजना से जुड़ा एक अन्य मामला पहले से पुलिस जांच के दायरे में है, जिसमें परियोजना प्रबंधन और कंपनी के बीच गंभीर आरोप-प्रत्यारोप सामने आए हैं। ऐसे में लगातार सामने आ रहे विवादों ने परियोजना की कार्यप्रणाली और प्रशासनिक निगरानी दोनों पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
अब पूरा मामला प्रशासन की निष्पक्ष जांच पर टिका हुआ है। क्योंकि यदि मांड नदी से पत्थरों की निकासी नियमों के अनुरूप हो रही है तो अनुमति और आदेश सार्वजनिक किए जाने चाहिए, और यदि ऐसा नहीं है तो यह स्पष्ट होना चाहिए कि आखिर नदी के भीतर चल रही इस गतिविधि को संरक्षण किसका प्राप्त है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है—जब लिखित अनुमति का कोई दस्तावेज सामने नहीं है, तब मांड नदी से पत्थरों की निकासी और परिवहन आखिर किसके आदेश पर किया जा रहा है?
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