5 हाथी कॉरिडोर चिन्हित, 10 किलोमीटर के दायरे में खनन गतिविधियां—धरमजयगढ़ में हाथियों के सुरक्षित रहवास पर खतरा
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धरमजयगढ़ – रायगढ़ जिले का धरमजयगढ़ वनमंडल लंबे समय से हाथियों की आवाजाही और मानव-हाथी द्वंद्व के लिए संवेदनशील क्षेत्र रहा है। इस पूरे वन परिदृश्य में छाल-करतला, क्रोंधा-रूपुंगा, हाटी-कुदमुरा, नागदरहा-बरौद और चारमार-जिंगोल जैसे पांच हाथी कॉरिडोर चिन्हित किए गए हैं। ऐसे संवेदनशील वन क्षेत्र में एक ओर हाथियों के आवागमन और रहवास की पहचान की गई है, वहीं दूसरी ओर कोयला खदानों से जुड़ी गतिविधियों का विस्तार वन्यजीव संरक्षण को लेकर गंभीर चिंता पैदा कर रहा है।

10 किलोमीटर के दायरे में चिन्हित हाथी आवागमन क्षेत्र
उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार कोयला खनन से संबंधित प्रस्तावित क्षेत्रों के 10 किलोमीटर के दायरे में हाथियों के आवागमन से संबंधित क्षेत्र चिन्हित किए गए हैं। वर्ष 2023 में भारतीय वन्यजीव संस्थान द्वारा किए गए अध्ययन में देश के विभिन्न हिस्सों में हाथी गलियारों की पहचान की गई थी। धरमजयगढ़ क्षेत्र से जुड़े चिन्हित मार्गों को देखते हुए यह तथ्य महत्वपूर्ण हो जाता है कि खनन गतिविधियों के लिए चिन्हित वन क्षेत्रों और हाथियों के आवागमन वाले परिदृश्य के बीच पर्याप्त निकटता मौजूद है।
हालांकि किसी हाथी कॉरिडोर का वैज्ञानिक अध्ययन में चिन्हित होना और उसका विधिवत अधिसूचित होना अलग-अलग प्रशासनिक स्थिति है, लेकिन किसी क्षेत्र में हाथियों की आवाजाही का वैज्ञानिक रूप से दर्ज होना उसके संरक्षण महत्व को नजरअंदाज करने का आधार नहीं हो सकता।
धरमजयगढ़ क्षेत्र में चिन्हित छाल-करतला, क्रोंधा-रूपुंगा, हाटी-कुदमुरा, नागदरहा-बरौद और चारमार-जिंगोल हाथी कॉरिडोरों को अलग-अलग छोटे वन क्षेत्रों के रूप में देखने के बजाय व्यापक वन परिदृश्य के हिस्से के रूप में देखना जरूरी है। हाथियों की आवाजाही किसी प्रशासनिक सीमा के अनुसार नहीं होती। भोजन, पानी, प्रजनन और सुरक्षित आवास की आवश्यकता के अनुसार उनका आवागमन कई किलोमीटर तक फैले वन क्षेत्रों में होता है।

यही कारण है कि किसी एक स्थान पर वनभूमि का उपयोग बदलने का प्रभाव केवल उसी भूखंड तक सीमित नहीं रहता। सड़क, खनन, परिवहन, बिजली और अन्य सहायक गतिविधियों के कारण जंगल में मानवीय आवाजाही बढ़ने पर हाथियों के पारंपरिक मार्गों पर दबाव पड़ सकता है।
कोयला खदानों के विस्तार से मानव-हाथी द्वंद्व का खतरा
धरमजयगढ़ क्षेत्र पहले से ही मानव-हाथी द्वंद्व की चुनौती झेल रहा है। ऐसे में हाथियों के आवागमन वाले क्षेत्रों के आसपास खनन गतिविधियों का विस्तार होने पर हाथियों के मार्ग में परिवर्तन, गांवों और कृषि क्षेत्रों की ओर उनकी आवाजाही तथा मानव-हाथी टकराव की घटनाओं की आशंका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
विशेष रूप से यदि हाथियों के पारंपरिक मार्गों के बीच खनन क्षेत्र, परिवहन मार्ग या अन्य स्थायी-अस्थायी गतिविधियां बढ़ती हैं तो वन्यजीव प्रबंधन के सामने यह चुनौती होगी कि हाथियों की आवाजाही को सुरक्षित रखते हुए मानव बस्तियों को भी जोखिम से कैसे बचाया जाए।
सिर्फ वनभूमि का आंकड़ा नहीं, हाथियों की आवाजाही भी बने मूल्यांकन का आधार
कोयला खदानों से संबंधित वन स्वीकृति प्रक्रिया में वनभूमि का क्षेत्रफल, पेड़ों की संख्या और प्रतिपूरक वनीकरण जैसे पहलू महत्वपूर्ण होते हैं, लेकिन हाथी प्रभावित क्षेत्र में वन्यजीव आवास और पारंपरिक आवागमन मार्ग भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। इसलिए यह स्पष्ट होना जरूरी है कि चिन्हित हाथी कॉरिडोरों से निकटता रखने वाली खनन परियोजनाओं के लिए वन्यजीव संबंधी अध्ययन में क्या निष्कर्ष दर्ज किए गए हैं, हाथियों की आवाजाही को लेकर क्या आंकड़े उपलब्ध कराए गए हैं और संभावित मानव-हाथी द्वंद्व को रोकने के लिए क्या ठोस प्रबंधन उपाय प्रस्तावित किए गए हैं।
धरमजयगढ़ वनमंडल में पांच चिन्हित हाथी कॉरिडोर और इनके आसपास बढ़ती कोयला खनन गतिविधियां एक ऐसे वन परिदृश्य की तस्वीर सामने रखती हैं, जहां विकास परियोजनाओं और वन्यजीव संरक्षण के बीच संतुलन का प्रश्न सीधे तौर पर जुड़ा हुआ है। 10 किलोमीटर के दायरे में हाथी आवागमन क्षेत्र की मौजूदगी को देखते हुए अब सबसे महत्वपूर्ण विषय यह है कि परियोजनाओं की स्वीकृति प्रक्रिया में इन वन्यजीव मार्गों का वास्तविक मूल्यांकन किस स्तर पर किया गया और हाथियों के सुरक्षित आवागमन को सुनिश्चित करने के लिए दस्तावेजों में क्या ठोस प्रावधान किए गए हैं।
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