शासकीय भूमि से पट्टा, फिर भू-स्वामी हक की कवायद; एसडीएम कोर्ट में पुराने पट्टे का दस्तावेज नहीं हुआ पेश !
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2017 की प्रविष्टि से लेकर ऑनलाइन रिकॉर्ड में बदलाव तक पटवारियों की भूमिका जांच के घेरे में

धरमजयगढ़। प्रस्तावित कोल ब्लॉक क्षेत्र में भू-अर्जन के लिए चिन्हित जमीनों के राजस्व रिकॉर्ड को लेकर एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने वर्षों पुरानी राजस्व प्रविष्टियों और उनके आधार पर हुई कार्रवाई की पूरी प्रक्रिया को जांच के दायरे में ला दिया है। धरमजयगढ़ कॉलोनी स्थित खसरा नंबर 356/1, रकबा 2.0230 हेक्टेयर भूमि के रिकॉर्ड में शासकीय भूमि से शासकीय पट्टे और फिर भू-स्वामी हक तक पहुंचने की प्रक्रिया सामने आती है।

मामले की गंभीरता इसलिए बढ़ जाती है क्योंकि संबंधित भूमि के पुराने राजस्व अभिलेख में यह भूमि खाली शासकीय भूमि के रूप में दर्ज बताई जाती है, जबकि वर्ष 2017 में इसी भूमि के संबंध में शासकीय पट्टेदार की प्रविष्टि सामने आती है। इसके बाद पट्टे को पूर्ण भू-स्वामी अधिकार में बदलने के लिए एसडीएम न्यायालय में प्रकरण पहुंचा।

एसडीएम कोर्ट में पुराने पट्टे का आधार ही नहीं हुआ साबित
एसडीएम न्यायालय में हुई कार्यवाही इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बनकर सामने आती है। संबंधित पक्ष की ओर से भूमि लगभग वर्ष 1980 के आसपास प्राप्त होने का दावा किया गया, लेकिन न्यायालयीन कार्यवाही में इस पुराने पट्टे से संबंधित आवश्यक दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किए जा सके।
न्यायालय द्वारा भू-स्वामी हक में दर्ज किए जाने का आवेदन निरस्त किए जाने के बाद अब वर्ष 2017 में राजस्व रिकॉर्ड में शासकीय पट्टेदार की प्रविष्टि किस आधार पर की गई थी, यह पूरा रिकॉर्ड परीक्षण का विषय बन गया है।
चार दशक पुराने कथित पट्टे का दस्तावेज न्यायालय में उपलब्ध नहीं होना और बाद में उसी आधार पर राजस्व रिकॉर्ड में अधिकार संबंधी प्रविष्टि का सामने आना पूरे मामले को असाधारण रूप से महत्वपूर्ण बना देता है।
2017 में पटवारी के हाथों हुई प्रविष्टि अब जांच का अहम बिंदु
इस मामले में वर्ष 2017 की राजस्व प्रविष्टि विशेष महत्व रखती है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार उस समय तत्कालीन हल्का पटवारी बाल मुकुंद सारथी के कार्यकाल में संबंधित भूमि के रिकॉर्ड में पट्टे से जुड़ी प्रविष्टि की गई।
अब जांच का सीधा केंद्र यह होना चाहिए कि उस समय पटवारी के समक्ष कौन-कौन से मूल दस्तावेज प्रस्तुत किए गए थे। कथित वर्ष 1980 के पट्टे का आदेश कहां था, किस अधिकारी ने जारी किया था, उसका क्रमांक और दिनांक क्या था तथा उस दस्तावेज के आधार पर भूमि की पहचान कैसे सुनिश्चित की गई।
यदि मूल पट्टा आदेश उपलब्ध नहीं था, तो वर्ष 2017 में राजस्व रिकॉर्ड में पट्टे की प्रविष्टि किस प्रमाणित आधार पर की गई—इसकी फाइल जांच से ही स्थिति स्पष्ट हो सकती है।
वर्तमान ऑनलाइन रिकॉर्ड में बदलाव ने बढ़ाई रिकॉर्ड जांच की जरूरत
मामले का दूसरा महत्वपूर्ण सिरा वर्तमान ऑनलाइन राजस्व रिकॉर्ड से जुड़ा है। उपलब्ध रिकॉर्ड में संबंधित खसरा नंबर के विवरण में भू-स्वामी संबंधी प्रविष्टि दिखाई देने की बात सामने आई है।
यहां वर्तमान हल्का पटवारी हरीश कुमार पैंकरा की भूमिका रिकॉर्ड परीक्षण के दायरे में आती है। खास तौर पर ऑनलाइन रिकॉर्ड में परिवर्तन की तारीख, उसके पीछे दर्ज आदेश और उस परिवर्तन के लिए अपनाई गई राजस्व प्रक्रिया की जांच आवश्यक है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ऑनलाइन रिकॉर्ड में परिवर्तन एसडीएम न्यायालय के आदेश से पहले हुआ अथवा बाद में, इसकी प्रमाणित तारीख और आधार सामने आना चाहिए। यदि न्यायालयीन प्रकरण के दौरान ही रिकॉर्ड में बदलाव किया गया था, तो संबंधित आदेश और सक्षम अधिकारी की स्वीकृति का परीक्षण आवश्यक होगा।
एक ही जमीन, दो दौर के पटवारी और रिकॉर्ड की बदलती तस्वीर
मामले में वर्ष 2017 के तत्कालीन हल्का पटवारी बाल मुकुंद सारथी और वर्तमान हल्का पटवारी हरीश कुमार पैंकरा की भूमिका अलग-अलग चरणों में सामने आती है।
एक ओर वर्ष 2017 में शासकीय भूमि से संबंधित पट्टा प्रविष्टि का रिकॉर्ड तैयार हुआ, वहीं दूसरी ओर बाद के चरण में ऑनलाइन रिकॉर्ड में भू-स्वामी संबंधी स्थिति दिखाई देने लगी।
इसलिए जांच केवल किसी एक प्रविष्टि तक सीमित रखने के बजाय वर्ष 2017 से वर्तमान तक पूरी राजस्व रिकॉर्ड श्रृंखला की जांच पर केंद्रित होनी चाहिए।
कोल ब्लॉक की जमीन होने से मामला और संवेदनशील
संबंधित भूमि प्रस्तावित कोल ब्लॉक क्षेत्र में होने के कारण यह मामला सामान्य राजस्व प्रविष्टि से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। यदि भविष्य में यह भूमि भू-अर्जन के दायरे में आती है तो स्वामित्व की स्थिति का सीधा प्रभाव मुआवजा निर्धारण पर पड़ सकता है।
ऐसे में भूमि के पुराने शासकीय रिकॉर्ड, कथित पट्टा, वर्ष 2017 की प्रविष्टि, बाद की राजस्व कार्यवाही, एसडीएम न्यायालय का आदेश और वर्तमान ऑनलाइन रिकॉर्ड—इन सभी का एक साथ सत्यापन किया जाना जरूरी है।
मुआवजे की प्रक्रिया से पहले खुलनी चाहिए रिकॉर्ड की पूरी परत
पूरे प्रकरण में सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज कथित पुराने पट्टे का मूल आदेश है। यदि वह उपलब्ध है तो उसकी प्रमाणिकता, जारी करने वाले प्राधिकारी, तारीख, क्रमांक और भूमि की पहचान का मिलान किया जाना चाहिए। यदि वह उपलब्ध नहीं है तो वर्ष 2017 में पट्टे की प्रविष्टि किस आधार पर हुई, यह भी रिकॉर्ड से स्पष्ट होना चाहिए।
साथ ही ऑनलाइन रिकॉर्ड में भू-स्वामी संबंधी प्रविष्टि किस आदेश के तहत दर्ज हुई, इसकी भी स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है।
शासकीय भूमि से पट्टा और फिर भू-स्वामी हक तक पहुंची 2.0230 हेक्टेयर भूमि की यह पूरी रिकॉर्ड यात्रा अब उच्च स्तरीय राजस्व जांच की मांग करती है।
जांच में यदि वर्ष 2017 की मूल फाइल, पट्टा संबंधी दस्तावेज, नामांतरण अभिलेख, आदेश पुस्तिका, खसरा एवं अधिकार अभिलेख तथा ऑनलाइन संशोधन का आधार सामने रख दिया जाता है, तो इस जमीन के अधिकार परिवर्तन की पूरी तस्वीर स्पष्ट हो सकती है।
फिलहाल उपलब्ध न्यायालयीन कार्यवाही के आधार पर किसी व्यक्ति या अधिकारी को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा, लेकिन रिकॉर्ड में हुए प्रत्येक परिवर्तन का दस्तावेजी आधार सामने आना बेहद जरूरी है—खासकर तब, जब जमीन प्रस्तावित कोल ब्लॉक के संभावित भू-अर्जन क्षेत्र से जुड़ी हो।
खुलेंगे कई और राज
धरमजयगढ़ क्षेत्र में जिस तरह से आये दिन जमीन फर्जीवाड़े के मामले लगातार सामने आ रहे हैं , इसे देखते हुये इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि आने वाले समय में और भी कई चौकाने वाले राज खुलेंगे , और इस राज के पीछे छिपे चेहरे भी बेनकाब होंगे , इन चेहरों में कई बड़े नाम भी शामिल हो सकते हैं !
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