जैविक खेती: मिट्टी की सेहत और किसान की समृद्धि का टिकाऊ रास्ता,डॉ. सुग्याता शिवहरे, एकेएस यूनिवर्सिटी,मृदा विज्ञान,विभाग विभागाध्यक्ष।
1 min read
सतना। भारत की कृषि व्यवस्था जिस दिशा में आगे बढ़ रही है, वह हमें गंभीर चिंतन के लिए बाध्य करती है। एकेएस यूनिवर्सिटी सतना ,मृदा विज्ञान की विभागाध्यक्ष सुग्याता शिवहरे के अनुसार,अधिक उत्पादन की अंधाधुंध दौड़ ने हमारी मिट्टी की सेहत को गहरे स्तर पर प्रभावित किया है। रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अत्यधिक प्रयोग ने अल्पकालिक लाभ तो दिए, किंतु दीर्घकाल में भूमि की उर्वरता, जल की गुणवत्ता और मानव स्वास्थ्य पर इसके नकारात्मक परिणाम स्पष्ट रूप से सामने आ रहे हैं।
वे स्पष्ट रूप से कहती हैं, “मिट्टी केवल उत्पादन का साधन नहीं है, बल्कि एक जीवंत तंत्र है। यदि इसकी सेहत बिगड़ती है, तो पूरी कृषि व्यवस्था असंतुलित हो जाती है।” उनके अनुसार, इस चुनौती का सबसे प्रभावी समाधान जैविक खेती के रूप में सामने आता है, जो प्रकृति के साथ संतुलन स्थापित करती है।

डॉ. सुग्याता शिवहरे बताती हैं कि जैविक खेती में गोबर खाद, कम्पोस्ट, हरी खाद और जैव उर्वरकों का प्रयोग कर मिट्टी की संरचना को सुदृढ़ किया जाता है। इससे मिट्टी में कार्बनिक पदार्थों की मात्रा बढ़ती है, जल धारण क्षमता में सुधार होता है और फसलें विपरीत परिस्थितियों में भी बेहतर उत्पादन देने में सक्षम होती हैं। इससे सिंचाई की आवश्यकता भी कम हो जाती है, जो जल संरक्षण के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण है।
फसल चक्र और मिश्रित खेती को वे जैविक खेती की आधारशिला मानती हैं। उनके अनुसार, दलहनी फसलों को फसल चक्र में शामिल करने से मिट्टी में नाइट्रोजन का प्राकृतिक संवर्धन होता है, जिससे रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम होती है। साथ ही, सहफसली प्रणाली अपनाने से कीटों और रोगों का प्रकोप नियंत्रित रहता है और किसानों को अतिरिक्त आय के अवसर भी प्राप्त होते हैं।
कीट एवं रोग प्रबंधन पर वे विशेष जोर देते हुए कहती हैं कि “प्राकृतिक उपाय ही स्थायी समाधान प्रदान करते हैं।” नीम आधारित घोल, फेरोमोन ट्रैप और चिपचिपे जाल जैसे उपाय पर्यावरण के अनुकूल होने के साथ-साथ प्रभावी भी हैं, जो जैविक खेती को और अधिक व्यवहारिक बनाते हैं।
आर्थिक दृष्टि से भी वे जैविक खेती को किसानों के लिए लाभकारी मानती हैं। उनके अनुसार, प्रारंभिक संक्रमण काल में कुछ कठिनाइयाँ अवश्य आती हैं, किंतु दीर्घकाल में उत्पादन लागत घटती है और जैविक उत्पादों को बाजार में अधिक मूल्य प्राप्त होता है, जिससे किसानों की आय में स्थायी वृद्धि संभव होती है।

वे यह भी स्वीकार करती हैं कि सरकार द्वारा संचालित योजनाएँ, जैसे परंपरागत कृषि विकास योजना, इस दिशा में सकारात्मक पहल हैं। किंतु उनके प्रभावी क्रियान्वयन के लिए किसानों को प्रशिक्षण, जागरूकता और सुदृढ़ विपणन सुविधाएँ उपलब्ध कराना अत्यंत आवश्यक है।
अंततः डॉ. सुग्याता शिवहरे के दृष्टिकोण से जैविक खेती केवल एक कृषि पद्धति नहीं, बल्कि एक व्यापक सोच है—जो प्रकृति, पर्यावरण और मानव जीवन के बीच संतुलन स्थापित करती है। वे स्पष्ट रूप से कहती हैं, “यदि हमें आने वाली पीढ़ियों के लिए उपजाऊ, सुरक्षित और स्वस्थ धरती सुनिश्चित करनी है, तो जैविक खेती को अपनाना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।”
इस प्रकार, विभागाध्यक्ष के दृष्टिकोण से यह स्पष्ट होता है कि जैविक खेती न केवल मिट्टी की उर्वरता को पुनर्जीवित करती है, बल्कि किसानों की समृद्धि और कृषि के सतत विकास की मजबूत आधारशिला भी सिद्ध होती है।

Subscribe to my channel