विकास से कोसों दूर हकीकत: मुख्यालय के पास गांव, ज़मीन पर नाव और ग्रामीणों के संघर्ष की सड़क ,
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विकासखंड मुख्यालय धरमजयगढ़ से महज कुछ किलोमीटर की दूरी पर स्थित ग्राम पंचायत नकना का आश्रित ग्राम कुधरीडांड आज विकास नहीं, बल्कि व्यवस्था की असफलता की पहचान बन चुका है। शहर की नज़दीकी के बावजूद इस गांव तक न पक्की सड़क है, न शुद्ध पेयजल की व्यवस्था और न ही बरसात में सुरक्षित आवागमन का कोई साधन। हालात इतने भयावह हैं कि ग्रामीण नाले का पानी पीने को मजबूर हैं।
ग्रामीणों का दावा है कि गांव तक पहुँचने के लिए जो कच्ची सड़क मौजूद है, उसे किसी सरकारी योजना से नहीं, बल्कि गांव वालों ने खुद आपसी सहयोग और श्रमदान से बनाया है। यदि यह सच है, तो यह सवाल अपने-आप खड़ा हो जाता है कि शासन-प्रशासन और निर्वाचित जनप्रतिनिधि आखिर कर क्या रहे हैं?
बरसात के दिनों में नदी-नाले भरते ही पूरा कुधरीडांड टापू में तब्दील हो जाता है। ऐसी स्थिति में बीमारों, गर्भवती महिलाओं और बुजुर्गों को इलाज के लिए नाव के सहारे ले जाना पड़ता है, जो किसी भी समय जानलेवा साबित हो सकता है। यह दृश्य किसी दूरस्थ वनांचल का नहीं, बल्कि विकासखंड मुख्यालय के आसपास बसे गांव का है।
सरकार सड़क, पेयजल और ग्रामीण संपर्क के लिए हर साल योजनाओं और बजट की लंबी सूची जारी करती है। फिर सवाल यह है कि इन योजनाओं का लाभ कुधरीडांड जैसे गाँवों तक क्यों नहीं पहुँचता? क्या योजनाएँ केवल कागजों और पोर्टलों तक सीमित रह गई हैं? क्या क्रियान्वयन में लापरवाही है या फिर निगरानी तंत्र पूरी तरह विफल हो चुका है?
और यदि प्रशासन यह दावा करता है कि योजनाओं का क्रियान्वयन सही ढंग से हो रहा है, तो फिर ग्रामीण खुद सड़क बनाने की बात क्यों कह रहे हैं? नाले का पानी पीने और नाव से मरीज ढोने की मजबूरी आखिर किस व्यवस्था की देन है?
मुख्यालय के इतने पास बसे गांव की यह स्थिति यह सोचने पर मजबूर करती है कि जब यहाँ विकास नहीं पहुँच पाया, तो दूर-दराज के गांवों का हाल क्या होगा, यह खुद ब खुद समझा जा सकता है । कुधरीडांड आज सुविधा ही नहीं, बल्कि जवाब भी मांग रहा है , उसके पिछड़ेपन के लिये जवाबदेह कौन है और अब जवाब देना शासन, प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी है।
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