DBL पर फर्जी हस्ताक्षर से सहमति पत्र तैयार करने का किसान का सनसनीखेज आरोप
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किसान की खुली चुनौती—“हस्तलेख विशेषज्ञ से करा लें जांच, सच सामने आ जाएगा”

धरमजयगढ़ – भारतमाला राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजना के निर्माण के बीच धरमजयगढ़ क्षेत्र में एक किसान की जमीन से मिट्टी उत्खनन का मामला अब गंभीर आरोपों के कारण तूल पकड़ता दिखाई दे रहा है। ग्राम सिसरिंगा निवासी किसान सुखनाथ दास महंत ने परियोजना में कार्यरत दिलीप बिल्डकॉन लिमिटेड (DBL) पर उसकी कृषि भूमि से बड़ी मात्रा में मिट्टी निकालने के बाद जमीन को बदहाल छोड़ने और मुआवजा नहीं देने का आरोप लगाया है। लेकिन इस मामले में सबसे गंभीर मोड़ तब आया, जब किसान ने प्रशासनिक रिकॉर्ड में संलग्न कथित सहमति पत्र की प्रामाणिकता पर ही सवाल खड़ा कर दिया।
किसान का दावा है कि कथित सहमति पत्र पर किए गए हस्ताक्षर उसके नहीं हैं। उसका कहना है कि उसने ऐसा कोई सहमति पत्र दिया ही नहीं, फिर उसके नाम से यह दस्तावेज प्रशासनिक रिकॉर्ड तक कैसे पहुंचा? किसान ने अपने आरोप को लेकर प्रशासन के सामने माँग रखते हुए कहा है कि कथित सहमति पत्र की जांच किसी स्वतंत्र हस्तलेख विशेषज्ञ से करा ली जाए, सच्चाई सामने आ जाएगी।
मामला ग्राम सिसरिंगा, तहसील धरमजयगढ़ की उस कृषि भूमि से जुड़ा है, जो किसान सुखनाथ दास महंत की स्वामित्व वाली बताई गई है। भूमि का खसरा क्रमांक 840/1 और रकबा 1.489 हेक्टेयर है। किसान के अनुसार उसके 13 सदस्यीय परिवार की आजीविका इसी जमीन पर निर्भर है। भारतमाला परियोजना के निर्माण के दौरान DBL के कर्मचारियों ने सड़क निर्माण के लिए भूमि से मिट्टी लेने की बात कही थी। किसान के अनुसार उस समय उसे भरोसा दिया गया था कि मिट्टी निकालने के बाद जमीन को समतल कर दिया जाएगा तथा खेत में पानी की निकासी के लिए आवश्यक व्यवस्था भी की जाएगी, ताकि जमीन पुनः कृषि योग्य बनी रहे।

किसान के अनुसार इसके बाद उसकी जमीन पर लगभग 120 मीटर लंबाई, 122 मीटर चौड़ाई और करीब एक मीटर गहराई तक खुदाई की गई और लगभग 14,640 घन मीटर मिट्टी निकालकर राष्ट्रीय राजमार्ग निर्माण में इस्तेमाल कर ली गई। किसान का आरोप है कि मिट्टी निकलने के बाद न तो जमीन को वादे के मुताबिक समतल किया गया और न ही जल निकासी की व्यवस्था की गई। परिणामस्वरूप खेत में गहरे गड्ढे और असमतल सतह बन गई है, जिससे कृषि कार्य प्रभावित हो रहा है और परिवार की आजीविका पर संकट खड़ा हो गया है।
किसान का कहना है कि यदि निर्माण कार्य के लिए उसकी जमीन से मिट्टी ली गई थी तो कम से कम उसे पहले की स्थिति में लाने की जिम्मेदारी पूरी की जानी चाहिए थी। लेकिन उसके अनुसार ऐसा नहीं हुआ और उसे इसके एवज में कोई आर्थिक क्षतिपूर्ति या मुआवजा भी नहीं मिला।

यहीं से मामला एक साधारण भूमि विवाद से आगे बढ़ता है।
किसान ने आरोप लगाया है कि अनुविभागीय अधिकारी राजस्व सह भू-अर्जन अधिकारी, धरमजयगढ़ के कार्यालय से प्रेषित पत्र के साथ जो कथित सहमति पत्र संलग्न किया गया है, वह उसकी जानकारी और सहमति के बिना तैयार किया गया है। किसान का कहना है कि उस दस्तावेज पर न तो उसके हस्ताक्षर हैं और न ही उसके परिवार के किसी सदस्य ने उस पर हस्ताक्षर किए हैं।
किसान का कहना हैकि “जब मैंने सहमति दी ही नहीं तो मेरे नाम से सहमति पत्र कैसे तैयार हो गया?”

इसी सवाल का जवाब जानने के लिए किसान ने कलेक्टर रायगढ़ से कथित सहमति पत्र की स्वतंत्र हस्तलेख विशेषज्ञ से जांच कराने की मांग की है। उसका कहना है कि उसके वास्तविक हस्ताक्षरों और कथित दस्तावेज पर मौजूद हस्ताक्षर का विशेषज्ञ परीक्षण कराया जाए। इससे यह स्पष्ट हो सकेगा कि दस्तावेज पर हस्ताक्षर वास्तव में उसी के हैं या नहीं।

यदि जांच में किसान के हस्ताक्षर नहीं पाए जाते हैं तो यह मामला केवल जमीन के समतलीकरण और मुआवजे तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह भी जांच का विषय बन जाएगा कि कथित दस्तावेज किस परिस्थिति में तैयार हुआ और उसे प्रशासनिक रिकॉर्ड में किस आधार पर प्रस्तुत किया गया। वहीं यदि हस्ताक्षर किसान के ही पाए जाते हैं तो उसके वर्तमान दावे की स्थिति भी जांच के आधार पर स्पष्ट हो जाएगी।

किसान ने बताया कि वह पहले ही एसडीओ राजस्व धरमजयगढ़ तथा DBL के संबंधित अधिकारियों के समक्ष आवेदन दे चुका है। इसके अलावा सीएम हेल्पलाइन में भी शिकायत दर्ज कराई गई, इसके बावजूद अपेक्षित कार्रवाई नहीं होने का आरोप लगाते हुए किसान ने अब कलेक्टर रायगढ़ को आवेदन सौंपकर निष्पक्ष जांच और राहत की मांग की है।

कलेक्टर को दिए गए आवेदन में किसान ने DBL के संबंधित अधिकारियों को उसकी जमीन का समुचित समतलीकरण कराने, जल निकासी के लिए नाली निर्माण कराने तथा 10 लाख रुपये की आर्थिक क्षतिपूर्ति दिलाने की मांग की है। साथ ही मामले को समय-सीमा की बैठक में रखकर शीघ्र निराकरण कराने का अनुरोध किया गया है। शिकायत की प्रतिलिपि रायगढ़ लोकसभा क्षेत्र के सांसद राधेश्याम राठिया तथा DBL के मुख्य तकनीकी निदेशक, भोपाल को भी भेजे जाने की जानकारी सामने आई है।

अब पूरे मामले की जांच में केवल यह देखना पर्याप्त नहीं होगा कि खेत की वर्तमान स्थिति क्या है। यह भी स्पष्ट करना होगा कि मिट्टी उत्खनन की अनुमति किस आधार पर दी गई, जमीन से कितनी मिट्टी निकाली गई, भूमि को समतल करने की जिम्मेदारी किसकी थी, किसान को क्षतिपूर्ति क्यों नहीं मिली और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि प्रशासनिक रिकॉर्ड में मौजूद कथित सहमति पत्र पर हस्ताक्षर वास्तव में किसके हैं।
किसान ने अपनी ओर से जांच की माँग कर दी है। अब निगाहें प्रशासन पर हैं। यदि कथित सहमति पत्र की निष्पक्ष हस्तलेख जांच होती है तो यह पूरे विवाद का एक महत्वपूर्ण सिरा पकड़ सकती है। क्योंकि सवाल सिर्फ यह नहीं है कि किसान की जमीन से मिट्टी किसने उठाई, सवाल यह भी है कि किसान की सहमति का दावा आखिर किस दस्तावेज के आधार पर किया गया।
फिलहाल किसान के आरोप जांच के विषय हैं, लेकिन उसकी जाँच की माँग ने पूरे मामले को एक ऐसे सवाल के सामने खड़ा कर दिया है जिसका जवाब कागजों से नहीं, निष्पक्ष जांच से ही मिलेगा।
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