नये अधिकारी, नए सवाल और पुरानी जांच! क्या अब फिर खुलेगी सिसरिंगा राइट ऑफ़ वे मामले की फाइल ?
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धरमजयगढ़ – उरगा–पत्थलगांव भारतमाला सड़क परियोजना के तहत ग्राम सिसरिंगा में सार्वजनिक संपत्तियों को हुई क्षति का मामला विभागीय जांच के बाद भी पूरी तरह खत्म होता नजर नहीं आ रहा है। वन विभाग ने शिकायत को सही माना है और सार्वजनिक संपत्तियों को नुकसान पहुंचने की बात भी अपने प्रतिवेदन में दर्ज की है। वहीं, इसी घटनाक्रम के बीच धरमजयगढ़ के वनमंडलाधिकारी जितेन्द्र कुमार उपाध्याय के तबादले और उनके स्थान पर सत्यदेव शर्मा के दायित्व संभालने के बाद अब यह चर्चा तेज है कि क्या नए अधिकारी के सामने यह मामला एक बार फिर नए सिरे से उठेगा?

मामले में विभागीय स्तर पर निर्माण एजेंसी द्वारा 1000 रुपये के स्टाम्प पर नोटरीकृत दस्तावेज के माध्यम से क्षतिग्रस्त संपत्तियों के पुनर्निर्माण की बात कहे जाने का उल्लेख किया गया है। लेकिन संबंधित दस्तावेज की प्रति सार्वजनिक तौर पर सामने नहीं आने से यह स्पष्ट नहीं हो सका है कि पुनर्निर्माण की जिम्मेदारी किन-किन संपत्तियों के लिए ली गई है।

यही वजह है कि अब सवाल दस्तावेज की वास्तविक विषयवस्तु पर भी है—क्या जांच में चिन्हित सभी क्षतिग्रस्त संपत्तियां उस दस्तावेज में शामिल हैं, या कुछ संपत्तियां उसमें दर्ज नहीं हैं? इसका जवाब दस्तावेज की प्रमाणित प्रति सामने आने के बाद ही पूरी तरह स्पष्ट हो सकेगा।
रिपोर्ट में सड़क की चौड़ाई दर्ज, लेकिन बाकी सवालों पर स्पष्ट निष्कर्ष कहां?

वन विभाग की जांच रिपोर्ट में सड़क की चौड़ाई और राइट ऑफ वे का उल्लेख किया गया है, लेकिन शिकायत से जुड़े इस महत्वपूर्ण पहलू पर स्पष्ट निष्कर्ष सामने नहीं आता कि निर्माण गतिविधियां निर्धारित राइट ऑफ वे की सीमा के भीतर ही हुईं या कहीं उससे बाहर भी कोई निर्माण हुआ।
इसी तरह वन अधिनियम अथवा वन संरक्षण से जुड़े प्रावधानों के संभावित उल्लंघन के सवाल पर भी रिपोर्ट में स्पष्ट निष्कर्ष या कार्रवाई का उल्लेख नजर नहीं आता।
यहां सवाल किसी पर आरोप लगाने का नहीं, बल्कि जांच की पूर्णता और पारदर्शिता का है। यदि उल्लंघन नहीं हुआ तो जांच रिपोर्ट में यह स्पष्ट क्यों नहीं किया गया? और यदि जांच के दायरे में यह पहलू आया ही नहीं, तो इसकी वजह क्या रही?
नया नेतृत्व, क्या पुराने सवालों के मिलेंगे जवाब?
वनमंडल में नेतृत्व परिवर्तन के बाद अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि नए वनमंडलाधिकारी के समक्ष यह मामला किस रूप में आता है और क्या पूर्व जांच के निष्कर्षों के साथ-साथ मूल शिकायत के सभी बिंदुओं का पुनः परीक्षण किया जाता है।
यदि दस्तावेजों, मौके की स्थिति और पूर्व जांच रिपोर्ट का तुलनात्मक परीक्षण होता है तो संभव है कि कुछ ऐसे तथ्य भी सामने आएं जो पहले स्पष्ट नहीं हो पाए। विशेष रूप से कथित अमृत सरोवर, मंदिर के पुजारी से संबंधित नुकसान और प्रभावित भूमि जैसे पहलुओं को लेकर भी यदि कोई दस्तावेजी तथ्य हैं, तो उनकी स्थिति स्पष्ट होना जरूरी है।
फिलहाल विभागीय रिकॉर्ड यह जरूर बताता है कि शिकायत को सही पाया गया और सार्वजनिक संपत्तियों को नुकसान की बात स्वीकार की गई, लेकिन इसके साथ जुड़े बाकी सवालों के जवाब अभी भी प्रतीक्षित हैं।
अब प्रश्न यह है कि क्या मामला केवल पुनर्निर्माण के आश्वासन तक सीमित रहेगा, या फिर जांच के वे पहलू भी स्पष्ट किए जाएंगे जिन पर अब तक स्थिति पूरी तरह सामने नहीं आई है?

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