मनरेगा की कार्यप्रणाली पर CAG का बड़ा खुलासा, 86% कार्य ग्रामसभा की मंजूरी के बिना; सोशल ऑडिट भी बेअसर !
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छत्तीसगढ़ में रोजगार गारंटी योजना के क्रियान्वयन पर उठे गंभीर सवाल, 18.26 लाख परिवारों को नहीं मिला काम, 53% से अधिक सोशल ऑडिट आपत्तियां लंबित
रायपुर – छत्तीसगढ़ में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के क्रियान्वयन को लेकर भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट ने व्यवस्था की कई गंभीर खामियों को उजागर किया है। 14 जुलाई 2026 को PIB रायपुर द्वारा जारी जानकारी के अनुसार, मार्च 2024 तक की अवधि पर आधारित निष्पादन लेखापरीक्षा रिपोर्ट में योजना के नियोजन, वित्तीय प्रबंधन, रोजगार उपलब्धता, निर्माण कार्यों और सोशल ऑडिट की व्यवस्था में व्यापक कमियां सामने आई हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, जांच के दायरे में शामिल 48 ग्राम पंचायतों में लगभग 86 प्रतिशत कार्य ग्रामसभा की अनिवार्य स्वीकृति के बिना कराए गए। वहीं, वर्ष 2019-20 से 2023-24 के बीच 152.36 लाख परिवारों ने रोजगार की मांग की, लेकिन केवल 134.10 लाख परिवारों को ही काम मिल सका। इस तरह 18.26 लाख परिवार रोजगार से वंचित रहे। हैरानी की बात यह है कि पात्र परिवारों को बेरोजगारी भत्ते का भुगतान भी नहीं किया गया।
रोजगार की स्थिति भी चिंताजनक रही। काम पाने वाले 134.10 लाख परिवारों में से 83 प्रतिशत को 100 दिनों से कम रोजगार मिला, जबकि महज 0.92 प्रतिशत परिवार ही निर्धारित 100 दिनों का रोजगार पूरा कर सके।
सोशल ऑडिट की व्यवस्था पर भी CAG ने गंभीर सवाल उठाए हैं। इसके लिए निर्धारित 58.68 करोड़ रुपये में से केवल 42.55 करोड़ रुपये खर्च किए गए। सोशल ऑडिट यूनिट के लगभग 45 प्रतिशत पद खाली रहे और कुछ वर्षों में 99.97 प्रतिशत तक ग्राम पंचायतों का सोशल ऑडिट नहीं हो सका। इतना ही नहीं, सोशल ऑडिट में सामने आई 53 प्रतिशत से अधिक आपत्तियां भी लंबित पाई गईं।
रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि स्वीकृत कार्यों में से अक्टूबर 2024 तक केवल 61 प्रतिशत ही पूरे हो पाए थे। कई परिसंपत्तियां अनुपयोगी और निष्क्रिय मिलीं। पर्याप्त धन उपलब्ध होने के बावजूद मजदूरी भुगतान में देरी तथा कर्मचारियों के भविष्य निधि (EPF) की ब्याज और जुर्माने सहित 84.59 करोड़ रुपये की देनदारी भी उजागर हुई।
CAG ने योजना के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए ग्रामसभा आधारित नियोजन, वित्तीय पारदर्शिता, मानव संसाधनों की उपलब्धता, नियमित निगरानी और सोशल ऑडिट व्यवस्था को मजबूत करने की अनुशंसा की है। रिपोर्ट के ये निष्कर्ष मनरेगा के जमीनी क्रियान्वयन और पंचायत स्तर पर जवाबदेही सुनिश्चित करने की आवश्यकता को रेखांकित करते हैं।

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