SECL के खिलाफ जमीन अधिग्रहण मामले में ग्रामीणों को बड़ी राहत, हाईकोर्ट ने रिव्यू याचिका खारिज
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2009 में अधिग्रहित भूमि के प्रभावित भूमिस्वामियों के अधिकारों का निर्धारण उसी समय लागू पुनर्वास नीति से होगा
दक्षिण पूर्वी कोलफील्ड्स लिमिटेड (SECL) को छाल तहसील के लात में जमीन अधिग्रहण से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट से झटका लगा है। न्यायमूर्ति विभु दत्ता गुरु की अदालत ने 11 अगस्त 2026 को SECL द्वारा दायर रिव्यू याचिका को खारिज करते हुए 27 जनवरी 2026 को दिए गए अपने पूर्व निर्णय में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि पूर्व निर्णय में ऐसी कोई स्पष्ट और प्रत्यक्ष त्रुटि नहीं है, जिसके आधार पर उसकी समीक्षा की जा सके।
मामला वर्ष 2009 में अधिग्रहित भूमि के प्रभावित भूमिस्वामियों को रोजगार और पुनर्वास संबंधी लाभ दिए जाने से जुड़ा है। हाईकोर्ट ने अपने 27 जनवरी 2026 के फैसले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा था कि प्रभावित भूमिस्वामियों के पुनर्वास संबंधी अधिकारों का निर्धारण भूमि अधिग्रहण की तारीख पर लागू राज्य पुनर्वास नीति के आधार पर किया जाना चाहिए।
मामले में 5 नवंबर 2009 के अवार्ड के तहत किए गए भूमि अधिग्रहण का संदर्भ सामने आया था। पूर्व आदेश में अदालत ने माना था कि प्रभावित भूमिस्वामियों को पुनर्वास लाभ दिए जाने का आश्वासन था और इन लाभों में रोजगार का प्रावधान भी शामिल था। अदालत के अनुसार, बाद में नीति अथवा विभागीय दिशा-निर्देशों में किए गए बदलाव के आधार पर उस समय अर्जित अधिकारों को समाप्त नहीं किया जा सकता।
इसके बाद SECL ने हाईकोर्ट के पूर्व आदेश पर पुनर्विचार की मांग करते हुए रिव्यू याचिका दाखिल की थी। कंपनी की ओर से परिवार के एक सदस्य को पहले ही रोजगार मिलने, भूमि स्वामित्व की अवधि, दो एकड़ भूमि पर एक रोजगार के प्रावधान, सहमति अथवा एमओयू समेत विभिन्न आधारों का हवाला दिया गया था। SECL ने इन्हीं आधारों पर पूर्व निर्णय में पुनर्विचार की मांग की थी।
हालांकि, हाईकोर्ट ने रिव्यू याचिका पर सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि समीक्षा याचिका का दायरा सीमित होता है। इसके माध्यम से उन मुद्दों को दोबारा गुण-दोष के आधार पर नहीं खोला जा सकता, जिन पर अदालत पहले ही अपना निर्णय दे चुकी है।
अदालत ने पाया कि SECL की ओर से उठाए गए अधिकांश मुद्दों पर 27 जनवरी 2026 के फैसले में पहले ही विचार किया जा चुका है। रिव्यू याचिका में ऐसी कोई स्पष्ट एवं प्रत्यक्ष त्रुटि रिकॉर्ड पर नहीं दिखाई गई, जो पूर्व निर्णय की समीक्षा के लिए आवश्यक आधार बन सके। इसी आधार पर अदालत ने SECL की रिव्यू याचिका को खारिज कर दिया।
हाईकोर्ट के इस आदेश को उन प्रभावित भूमिस्वामियों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जिनकी भूमि वर्ष 2009 में अधिग्रहित की गई थी और जो पुनर्वास तथा रोजगार संबंधी अपने अधिकारों का दावा कर रहे हैं। विशेष रूप से महत्वपूर्ण यह है कि अदालत ने अधिकारों के निर्धारण के लिए बाद में बदली गई नीतियों के बजाय अधिग्रहण की तारीख पर लागू पुनर्वास नीति को आधार माना है।
पूर्व आदेश के अनुसार, याचिकाकर्ताओं द्वारा किए गए पुनर्वास संबंधी दावे पर संबंधित प्राधिकारी को भूमि अधिग्रहण की तारीख पर प्रभावी राज्य पुनर्वास नीति के अनुरूप 45 दिनों के भीतर विचार करना होगा।
इस तरह 11 अगस्त 2026 का हाईकोर्ट का आदेश फिलहाल प्रभावित भूमिस्वामियों के पक्ष में एक महत्वपूर्ण न्यायिक राहत के रूप में सामने आया है। हालांकि , पुनर्वास एवं रोजगार संबंधित दावों की जांच और लागू नीति के अनुसार सक्षम प्राधिकारी द्वारा लिए जाने वाले निर्णय पर निर्भर करेगा।
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