फर्जीवाड़ा करने वालों तक ही क्यों रुक जाती है जांच? पूरी व्यवस्था की जवाबदेही तय क्यों नहीं होती ?
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धरमजयगढ़ जैसे वनांचल क्षेत्र में जमीन से जुड़े फर्जीवाड़े सामने आना केवल किसी एक क्रेता, विक्रेता या फर्जी दस्तावेज तक सीमित मामला नहीं है। यदि किसी ने जानबूझकर फर्जी दस्तावेज तैयार किए, गलत पहचान से जमीन खरीदी-बेची या धोखाधड़ी की, तो उसके खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई होनी ही चाहिए। लेकिन सवाल यह है कि फर्जीवाड़ा सरकारी रिकॉर्ड तक पहुंचा कैसे? कौन लोग होते हैं जो परदे के पीछे से बड़ी भूमिका निभाते हैं , आखिर एक प्रक्रिया के तार एक दूसरे से जुड़े होने के बाद भी पक्ष दोषी और दूसरा बेदाग कैसे हो जाता है !
जमीन का कोई भी रिकॉर्ड सीधे राजस्व अभिलेख में दर्ज नहीं हो जाता। दस्तावेज तैयार होते हैं, पहचान और अभिलेखों का परीक्षण होता है, पंजीयन होता है, नामांतरण की प्रक्रिया पूरी होती है और फिर सरकारी रिकॉर्ड में प्रविष्टि दर्ज होती है। ऐसे में यदि कोई फर्जी व्यक्ति वास्तविक भूमिस्वामी बनकर सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज हो गया, तो जांच केवल यह जानने तक सीमित क्यों रहे कि फर्जीवाड़ा किसने किया? यह भी तो पता चलना चाहिए कि सरकारी प्रक्रिया में वह फर्जीवाड़ा पकड़ा क्यों नहीं गया।
दस्तावेजों की जांच किस स्तर पर हुई, हुईं भी या नहीं ? पहचान का सत्यापन किसने किया? राजस्व अभिलेखों का परीक्षण कैसे हुआ? नामांतरण किन दस्तावेजों के आधार पर हुआ? यदि कहीं गंभीर विसंगति थी तो वह नजरअंदाज कैसे हुई ? आखिर एक पक्ष गुनहगार और दूसरा पक्ष पाक साफ कैसे हो जाता है ?
यह कहना उचित नहीं कि हर पटवारी, राजस्व निरीक्षक, तहसीलदार या पंजीयन अधिकारी की भूमिका संदिग्ध है। उसी तरह हर क्रेता या विक्रेता को निर्दोष मान लेना भी उचित नहीं। दोषी कौन है और कौन निर्दोष, इसका फैसला निष्पक्ष जांच से होना चाहिए। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है , जांच की आंच अधिकारियों-कर्मचारियों तक पहुंचने से पहले ही क्यों ठंडी पड़ जाती है ?
यदि किसी अधिकारी या कर्मचारी की कोई भूमिका नहीं है तो विस्तृत जांच उसे निर्दोष साबित कर देगी। लेकिन जांच किए बिना ही किसी को क्लीन चिट देना सवाल खड़े करता है। आखिर जब फर्जीवाड़े की प्रक्रिया कई सरकारी स्तरों से गुजरती है, तो जिम्मेदारी तय करने के दौरान उन सभी स्तरों की भूमिका की पड़ताल क्यों नहीं होनी चाहिए?
जमीन संबंधी मामलों की निष्पक्ष जांच का सवाल केवल यह नहीं होना चाहिए कि “फर्जीवाड़ा करने वाला कौन था?” बल्कि यह भी होना चाहिए कि “फर्जीवाड़ा हुआ कैसे ? दस्तावेज जिन्हें फर्जी बताया गया वह सरकारी रिकॉर्ड तक पहुंचा कैसे, किस-किस स्तर से गुजरा और रास्ते में उसे रोकने की जिम्मेदारी किसकी थी ?” उसे जाँचने परखने और सत्यापन करने की जिम्मेदारी किसकी थी ?
क्योंकि जमीन फर्जीवाड़े की असली परत तभी खुलेगी, जब जांच केवल मोहरों तक सीमित न रहकर उस पूरी प्रक्रिया की पड़ताल करे, जिसके रास्ते से फर्जीवाड़ा सरकारी रिकॉर्ड तक पहुंचा। जवाबदेही घटना की नहीं, पूरी प्रक्रिया की तय होनी चाहिए।
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