धड़ल्ले से आगे बढ़ रही के पी सी एल की कागजी प्रक्रिया !राजस्व वन भूमि के लिये मार्च में मिला एन ओ सी , सड़क और वन क्षेत्र को लेकर फंस गया है पेंच मंत्रालय ने लगाई सवालों की झड़ी!
1 min read

धरमजयगढ़ – सरिया–दुर्गापुर कोयला परियोजना की वन स्वीकृति प्रक्रिया में एक ओर केपीसीएल की कागजी कार्रवाई लगातार आगे बढ़ रही है। राजस्व वन भूमि के उपयोग के लिए दिनाँक 13/03/2026 को जिला कलेक्टर की अनापत्ति भी मिल चुकी है। वहीं दूसरी ओर पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा उठाए गए कुछ महत्वपूर्ण प्रश्नों का अब तक संतोषजनक उत्तर प्रस्तुत नहीं किया जा सका है, जिसके चलते परियोजना की वन स्वीकृति अंतिम चरण तक नहीं पहुंच पाई है।

मंत्रालय ने परियोजना प्रस्ताव में उल्लेखित हाटी–धरमजयगढ़ राज्य मार्ग को लेकर स्पष्ट जानकारी मांगी है। प्रस्ताव के अनुसार यह सड़क लगभग एक किलोमीटर तक प्रस्तावित खनन क्षेत्र से होकर गुजरती है। मंत्रालय ने पूछा है कि जब यह कोरबा और धरमजयगढ़ के बीच प्रमुख संपर्क मार्ग है, तब इसे बंद करने या इसके स्थान पर वैकल्पिक व्यवस्था कैसे सुनिश्चित की जाएगी। साथ ही राष्ट्रीय राजमार्ग-130 ए की वर्तमान प्रगति तथा आम नागरिकों की निर्बाध आवाजाही बनाए रखने की योजना पर भी स्पष्ट जवाब मांगा गया है।
इसके अलावा मंत्रालय ने यह भी पूछा है कि वन भूमि में नई कोयला खदान खोलने की आवश्यकता आखिर क्या है। समेकित दिशा-निर्देशों के अनुसार इसका विस्तृत औचित्य प्रस्तुत किया जाना अनिवार्य है, लेकिन इस संबंध में अपेक्षित स्पष्टीकरण अभी तक उपलब्ध नहीं कराया गया है।
मंत्रालय ने परियोजना क्षेत्र में दुर्लभ वनस्पतियों एवं संरक्षित वन्यजीवों की मौजूदगी को भी गंभीरता से लिया है। प्रस्ताव में परसा, सफेद मूसली, काला मूसली, दुधी, बीजा और महुआ जैसी वनस्पतियों के साथ जंगल कैट तथा भारतीय लोमड़ी सहित कई संरक्षित प्रजातियों का उल्लेख किया गया है। इसके बावजूद इन प्रजातियों पर खनन के संभावित प्रभाव, उनके संरक्षण के उपाय तथा मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक की विस्तृत टिप्पणी अब तक प्रस्तुत नहीं की गई है।
मंत्रालय ने पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन को लेकर भी विस्तृत जानकारी मांगी है। जानकारी के अनुसार परियोजना से छह गांव तथा 128 परियोजना प्रभावित एवं विस्थापित परिवारों का उल्लेख किया गया है। मंत्रालय ने इन आंकड़ों की पुष्टि के साथ यह भी जानना चाहा है कि प्रभावित परिवारों का सर्वेक्षण किस आधार पर किया गया, पुनर्वास योजना की वर्तमान स्थिति क्या है, क्या उसका अनुमोदन हो चुका है तथा उसका क्रियान्वयन किस चरण में है।
मंत्रालय के इन प्रश्नों से स्पष्ट है कि अंतिम निर्णय से पहले वह केवल वन भूमि हस्तांतरण तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि सार्वजनिक सड़क, वन्यजीव संरक्षण, नई खदान की आवश्यकता और प्रभावित परिवारों के पुनर्वास जैसे मूलभूत पहलुओं पर भी पूरी तरह संतुष्ट होना चाहता है। इन बिंदुओं पर अपेक्षित स्पष्टीकरण मिलने के बाद ही परियोजना की वन स्वीकृति प्रक्रिया आगे बढ़ने की संभावना है। बहरहाल के पी सी एल अपनी कागजी प्रक्रिया को धड़ल्ले से आगे बढ़ा रहा है , लेकिन प्रक्रिया में कदम दर कदम आ रही समस्यायें और सवाल उसके मार्ग में फिलहाल रोड़ा बनकर खड़े हैं !
Subscribe to my channel