विकास बनाम पर्यावरण: कोयला परियोजना , सड़क परियोजना , लेमरू रिजर्व का दायरा और चुनिंदा विरोध पर सुलगते सवाल
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धरमजयगढ़ – छत्तीसगढ़ के वन अंचलों में ढांचागत विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच का अंतर्विरोध एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गया है। हाल ही में राष्ट्रीय राजमार्ग-130ए के उरगा से पत्तथलगाँव खंड पर चार लेन सड़क निर्माण (री-अलाइनमेंट) और भारतमाला परियोजना के तहत आने वाले 7.45 किलोमीटर लंबे हिस्से (डिज़ाइन किलोमीटर 114+410 से 121+450) के सम्बन्ध में प्रशासनिक जानकारी सामने आई है जिसमें जहां सड़क निर्माण के लिए हजारों पेड़ों के विदोहन और वन्यजीवों के आवागमन के लिये अंडर पास / ओवर पास बनाये जाने का उल्लेख किया गया है !
वन विभाग के प्रतिवेदनों से यह स्पष्ट होता है कि यह प्रस्तावित मार्ग हाथियों और अन्य वन्यजीवों के मुख्य विचरण क्षेत्र से होकर गुजरता है। हालांकि यह क्षेत्र किसी राष्ट्रीय उद्यान या अभयारण्य की सीमा के 10 किलोमीटर के दायरे में सीधे तौर पर नहीं आता, लेकिन एशियाई हाथियों के लिए बेहद संवेदनशील ‘लेमरू हाथी रिजर्व’ इस मार्ग से महज 6 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। आश्चर्यजनक रुप से प्रशासनिक अभिलेख लेमरू हाथी रिज़र्व क्षेत्र को प्रस्तावित क्षेत्र से मात्र 6 किलोमीटर की दूरी पर बता रहें हैं बावजूद इसके विकास के नाम पर कोयला परियोजनाओं और सड़क परियोजनाओं को धड़ल्ले से स्वीकृति मिल रही है !

क्षेत्र में हाथियों और विभिन्न प्रकार के पक्षियों की मौजूदगी को देखते हुए, वन्यजीव प्रबंधन योजना तैयार करने और सड़क मार्ग पर हाथियों की सुरक्षित आवाजाही के लिए विशेष अंडरपास, ओवरपास और हाथी पार पथ (एलीफेंट ओवरपास) बनाने का प्रस्ताव दिया गया है। तकनीकी विवरण के अनुसार, इस छोटे से हिस्से में कुल 25 प्रमुख संरचनाएं (जिनमें कलवर्ट, पुल और विशेष वन्यजीव मार्ग शामिल हैं) प्रस्तावित हैं। इसके बावजूद, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई और जंगलों के विदोहन से इस क्षेत्र की पारिस्थिकी पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।

मानव-हाथी संघर्ष का बढ़ता खतरा
धरमजयगढ़ और आसपास का यह क्षेत्र पहले से ही भीषण मानव-हाथी संघर्ष का सामना कर रहा है। जंगलों के कटने, प्राकृतिक गलियारों के खंडित होने और मानवीय दखल बढ़ने से हाथियों के गांवों की तरफ भटकने की आशंका और अधिक बढ़ जाती है। पर्यावरणविदों के अनुसार, इस प्रकार के बड़े निर्माण कार्यों से वन्यजीवों का जीवन संकट में पड़ जाता है।

चुनिंदा विरोध और मौन स्वीकृति: क्या यह स्वार्थ का खेल है?
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे पेचीदा और अप्रत्याशित पहलू यह है कि जब कोयला परियोजनाओं या खदानों की बात आती है, तो भूमि अर्जन, पेड़ों के कटने और वन्यजीवों पर असर के नाम पर हायतौबा मचाई जाती है, जनभावनाओं को हवा दी जाती है और बड़े-बड़े विरोध प्रदर्शन किए जाते हैं।
लेकिन आश्चर्यजनक रूप से, जब ठीक यही प्रक्रियाएं , यानी भू-अर्जन, पेड़ों का विदोहन और वन्यजीव मार्गों पर प्रभाव—सड़क परियोजनाओं या बुनियादी ढांचे के विकास में होती हैं, तो कथित पर्यावरण प्रेमी और समाजसेवी संगठन पूरी तरह मौन साधे रहते हैं। कोयला खदानों और राष्ट्रीय राजमार्ग निर्माण दोनों में ही पर्यावरणीय क्षति का पैमाना लगभग समान रहता है, फिर भी सड़कों के मामले में यह ‘चयननात्मक चुप्पी’ क्यों है? क्या पर्यावरण संरक्षण का यह मुखौटा केवल चुनिंदा प्रोजेक्ट्स को निशाना बनाकर अपनी राजनीतिक या वैचारिक रोटियां सेकने का जरिया मात्र बनकर रह गया है?
विकास , ऊर्जा और संपर्क मार्ग देश की जरूरत हैं, लेकिन इसके नाम पर दोहरे मानदंड अपनाना और पर्यावरण के नाम पर सुविधा की राजनीति करना न्यायसंगत नहीं है। जनता और जागरूक समाज को यह समझने की आवश्यकता है कि पर्यावरण और वन्यजीवों की सुरक्षा का पैमाना हर विकास परियोजना के लिए एक समान होना चाहिए, न कि विरोध या समर्थन की सुविधा के अनुसार तय किया जाना चाहिए।
धरमजयगढ़ के बांसजोर में होगी लैंड बैंक की स्थापना, वन विभाग ने दी अनापत्ति
छत्तीसगढ़ के धरमजयगढ़ क्षेत्र में प्रशासनिक और भू-उपयोग की दिशा में एक नया कदम सामने आया है। जिला रायगढ़ के धरमजयगढ़ वनमंडल के अंतर्गत लैंड बैंक की स्थापना के लिए स्थल को उपयुक्त मानते हुए आधिकारिक अनापत्ति प्रमाण पत्र जारी कर दिया गया है।
जानकारी के अनुसार, यह प्रस्तावित लैंड बैंक धरमजयगढ़ परिक्षेत्र एवं तहसील के अंतर्गत आने वाले ग्राम – बांसजोर (पटवारी हल्का नंबर 56) में स्थापित किया जाना है। इस परियोजना के लिए खसरा नंबर 1311/1/क/1 की कुल 13.34 हेक्टेयर भूमि का चयन किया गया है। राजस्व रिकॉर्ड में यह पूरी भूमि ‘छोटे-बड़े झाड़ के जंगल’ मद में दर्ज है।
राजस्व और प्रशासनिक आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए, इस लैंड बैंक की स्थापना के संबंध में उपर्युक्त खसरा भूमि पर वन विभाग द्वारा कोई आपत्ति नहीं जताई गई है, जिसके बाद इसे औपचारिक स्वीकृति मिल गई है।
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