लैलूंगा के सेंट माइकल स्कूल में 9 वर्षीय छात्र से मारपीट का आरोप, स्कूल से पुलिस-शिक्षा विभाग तक उठे सवाल
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कथित रैगिंग और मारपीट की शिकायत के बाद स्कूल प्रबंधन की निगरानी व्यवस्था, पुलिस की कार्रवाई और शिक्षा विभाग की भूमिका पर नजर
लैलूंगा/रायगढ़। लैलूंगा स्थित सेंट माइकल इंग्लिश मीडियम स्कूल में कक्षा तीसरी के 9 वर्षीय छात्र के साथ कथित रैगिंग, मारपीट और धमकी का मामला सामने आया है। मामले को लेकर थाना लैलूंगा में दिए गए लिखित आवेदन में स्कूल परिसर में छात्र का रास्ता रोककर उसके साथ मारपीट किए जाने और घटना की जानकारी देने पर धमकी दिए जाने जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं।
शिकायत में घटना 21 अगस्त 2026 को सुबह करीब 11:30 बजे की बताई गई है। आवेदन के अनुसार, घटना स्कूल परिसर में उस समय हुई जब छात्र अन्य बच्चों के साथ था। शिकायत में चोट लगने और घटना के दौरान बीच-बचाव करने वाले अन्य विद्यार्थियों के साथ भी कथित अभद्रता किए जाने का उल्लेख है।
स्कूल प्रबंधन से बड़ा सवाल—बच्चों की निगरानी कहां थी?
मामले में सबसे पहला सवाल सेंट माइकल इंग्लिश मीडियम स्कूल प्रबंधन की निगरानी व्यवस्था पर उठता है। यदि शिकायत में लगाए गए आरोप स्कूल परिसर के भीतर हुई घटना से संबंधित हैं, तो उस समय शिक्षक और स्कूल कर्मचारी कहां थे?
स्कूल में छोटे और बड़े विद्यार्थियों के बीच अनुशासन बनाए रखने के लिए क्या निगरानी व्यवस्था है? संवेदनशील स्थानों पर शिक्षकों की निगरानी कितनी नियमित है? शिकायत मिलने के बाद स्कूल प्रबंधन ने बच्चे की सुरक्षा के लिए क्या कदम उठाए? इन सवालों का स्पष्ट जवाब अभिभावकों और शिक्षा विभाग के सामने आना चाहिए।
बीईओ के सामने भी जवाबदेही का सवाल
शिकायत की प्रति खंड शिक्षा अधिकारी, लैलूंगा को भी दिए जाने का उल्लेख है। ऐसे में अब शिक्षा विभाग की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।
बीईओ स्तर से यह देखा जाना चाहिए कि विद्यालय में विद्यार्थियों की सुरक्षा के लिए निर्धारित नियमों और निगरानी व्यवस्था का पालन हो रहा है या नहीं। साथ ही मामले की निष्पक्ष जांच कर यह पता लगाना जरूरी है कि घटना की जानकारी स्कूल प्रबंधन को कब मिली और शिकायत के बाद विद्यालय ने क्या कार्रवाई की।
यदि जांच में स्कूल स्तर पर लापरवाही सामने आती है, तो जिम्मेदारी तय किए जाने की जरूरत होगी।
पुलिस के सामने गंभीर चुनौती
मामले में पुलिस से चिकित्सकीय परीक्षण/MLC और प्राथमिकी दर्ज करने की मांग की गई है। अब पुलिस के सामने शिकायत में लगाए गए आरोपों की निष्पक्ष जांच करना महत्वपूर्ण होगा।
पुलिस को घटना का क्रम, प्रत्यक्षदर्शी विद्यार्थियों की जानकारी, उपलब्ध साक्ष्य और चोटों से संबंधित चिकित्सकीय दस्तावेजों की जांच करनी होगी। चूंकि मामला नाबालिग बच्चों से जुड़ा है, इसलिए जांच के दौरान बच्चों की पहचान और गोपनीयता की सुरक्षा भी महत्वपूर्ण है।
यह स्पष्ट करना जरूरी है कि शिकायत में FIR और MLC की मांग किए जाने का अर्थ यह नहीं है कि पुलिस ने आरोपों को प्रमाणित कर दिया है। अंतिम स्थिति जांच के बाद ही स्पष्ट होगी।
शिक्षा विभाग की जांच से सामने आ सकती है स्कूल की वास्तविक स्थिति
मामला केवल दो विद्यार्थियों के बीच विवाद मानकर समाप्त करने के बजाय स्कूल में बच्चों की सुरक्षा व्यवस्था की व्यापक समीक्षा की आवश्यकता भी सामने आती है।
शिक्षा विभाग को यह देखना होगा कि विद्यालय में रैगिंग और विद्यार्थियों के बीच मारपीट रोकने के लिए क्या व्यवस्था है, शिकायतों के निवारण की प्रक्रिया क्या है और स्कूल प्रबंधन ऐसी घटनाओं की सूचना मिलने पर किस प्रकार कार्रवाई करता है।
अभिभावकों की चिंता बढ़ी
स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों के अभिभावकों के लिए यह घटना चिंता का विषय बन सकती है। अभिभावक यह जानना चाहेंगे कि स्कूल परिसर में उनके बच्चों की सुरक्षा किस स्तर पर सुनिश्चित की जा रही है और किसी अप्रिय घटना की स्थिति में स्कूल की प्रतिक्रिया व्यवस्था कितनी प्रभावी है।
अब चार स्तरों पर जवाबदेही की जरूरत
इस पूरे मामले में चार स्तर महत्वपूर्ण हैं—
1. स्कूल प्रबंधन: विद्यार्थियों की निगरानी और सुरक्षा व्यवस्था की जवाबदेही।
2. बीईओ/शिक्षा विभाग: स्कूल की व्यवस्थाओं और शिकायत पर विभागीय स्तर से आवश्यक जांच।
3. पुलिस: शिकायत में लगाए गए आरोपों की निष्पक्ष जांच तथा कानून के अनुसार आगे की कार्रवाई।
4. अभिभावक और स्थानीय प्रशासन: नाबालिग छात्र की सुरक्षा, चिकित्सा और मानसिक स्थिति को प्राथमिकता देना।
आरोप सही पाए गए तो तय होनी चाहिए जिम्मेदारी
फिलहाल मामला शिकायत और उसमें लगाए गए आरोपों के स्तर पर है। आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि जांच के बाद ही हो सकेगी। लेकिन यदि जांच में शिकायत में लगाए गए आरोप सही पाए जाते हैं, तो केवल संबंधित विद्यार्थियों की जिम्मेदारी तय करना पर्याप्त नहीं होगा; स्कूल परिसर में सुरक्षा और निगरानी व्यवस्था में किसी स्तर की लापरवाही पाई जाती है तो उसकी भी जवाबदेही तय होनी चाहिए।
उद्घोष समय की अपील: मामला नाबालिग बच्चों से जुड़ा है, इसलिए पीड़ित बच्चे की पहचान, नाम, पता, फोटो या ऐसी कोई जानकारी प्रकाशित नहीं की जानी चाहिए जिससे उसकी पहचान उजागर हो। निष्पक्ष जांच के साथ बच्चे की सुरक्षा और मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता देना आवश्यक है।
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