एकेएस विश्वविद्यालय में किसानों को दी गई नाडेप खाद निर्माण की जानकारीनाडेप विधि किसानों के लिए सस्ती, सरल और टिकाऊ तकनीक : डॉ. वासुदेव द्विवेदी
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सतना। नैक एक्रेडिटेड एवं यूजीसी से मान्यता प्राप्त एकेएस विश्वविद्यालय, सतना के कृषि संकाय द्वारा किसानों को टिकाऊ एवं पर्यावरण अनुकूल कृषि पद्धतियों के प्रति जागरूक करने के उद्देश्य से नाडेप खाद निर्माण विधि की उपयोगिता पर जानकारी साझा की गई। कृषि संकाय के एग्रोनॉमी वैज्ञानिक डॉ. वासुदेव द्विवेदी ने बताया कि नाडेप विधि प्राकृतिक खाद निर्माण की एक ऐसी तकनीक है, जो कम लागत में उच्च गुणवत्ता की जैविक खाद उपलब्ध कराती है तथा भूमि की उर्वरा शक्ति को लंबे समय तक बनाए रखने में सहायक सिद्ध होती है।

डॉ. द्विवेदी ने बताया कि इस विधि का विकास महाराष्ट्र के यवतमाल जिले के नारायण देव राव पंडरी पांडे द्वारा किया गया था। नाडेप खाद तैयार करने के लिए विशेष प्रकार के टैंक बनाए जाते हैं। इन टैंकों को सबसे पहले गोबर से लीपा जाता है, जिसके बाद खेतों में उपलब्ध फसल अवशेषों की लगभग छह इंच मोटी परत बिछाई जाती है। इस पर गोबर के घोल का छिड़काव कर सामग्री को नम किया जाता है और फिर लगभग 50 किलोग्राम महीन मिट्टी की परत डाली जाती है। इसी प्रक्रिया को 10 से 12 बार दोहराकर संरचना को झोपड़ीनुमा आकार देकर लीप दिया जाता है।
उन्होंने बताया कि नाडेप टैंक में बने छिद्रों के कारण पर्याप्त वायु संचार बना रहता है, जिससे जैविक अपघटन की प्रक्रिया तीव्र गति से होती है और फसल अवशेष शीघ्र ही उत्तम कार्बनिक खाद में परिवर्तित हो जाते हैं। लगभग 100 दिनों में एक टैंक से 2.5 से 3 टन तक जैविक खाद प्राप्त की जा सकती है।
डॉ. द्विवेदी के अनुसार नाडेप खाद के उपयोग से मिट्टी की उर्वरता एवं जैविक गुणों में सुधार होता है। इससे रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम होती है और किसानों की लागत घटती है। साथ ही खेतों में बचने वाले फसल अवशेषों का प्रभावी प्रबंधन भी संभव हो जाता है। उन्होंने कहा कि नरवाई जलाने से पर्यावरण प्रदूषण बढ़ता है तथा मिट्टी के उपयोगी जीवाणु नष्ट हो जाते हैं, जबकि नाडेप विधि अपनाने से पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ कृषि उत्पादन में भी वृद्धि होती है।
उन्होंने बताया कि नाडेप खाद में औसतन 1.5 प्रतिशत नाइट्रोजन, 1 प्रतिशत फास्फोरस और 1.2 प्रतिशत पोटाश के साथ अनेक आवश्यक सूक्ष्म पोषक तत्व पाए जाते हैं, जो फसलों के संतुलित विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
डॉ. वासुदेव द्विवेदी ने किसानों से आह्वान किया कि वे फसल अवशेषों को जलाने के बजाय उनका उपयोग नाडेप खाद निर्माण में करें। यह न केवल पर्यावरण संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है, बल्कि टिकाऊ कृषि और बेहतर उत्पादन का भी आधार है। एकेएस विश्वविद्यालय का कृषि संकाय किसानों तक वैज्ञानिक एवं व्यवहारिक कृषि तकनीकों को पहुंचाने के लिए निरंतर प्रयासरत है।
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