July 1, 2026

Udghosh Samay News

खबर जहां हम वहां

बायसी, बायसी कॉलोनी सहित 6 गांव होंगे प्रभावित : दुर्गापुर II सरिया कोल ब्लॉक में 12 हजार से अधिक पेड़ों की कटाई 128 परिवारों पर विस्थापन का खतरा !

1 min read
Spread the love

रायगढ़ जिले के धरमजयगढ़ वनमंडल क्षेत्र में प्रस्तावित दुर्गापुर II सरिया कोल ब्लॉक परियोजना अब पर्यावरण और विस्थापन दोनों दृष्टि से बड़ी चर्चा का विषय बनती जा रही है। परियोजना से दस्तावेजों के अनुसार परियोजना के लिए लगभग 290.399 हेक्टेयर वन भूमि को गैर वानिकी उपयोग हेतु प्रस्तावित किया जायेगा । वहीं इस
परियोजना में करीब 12,528 पेड़ों की कटाई का अनुमान भी सामने आया है।


पेड़ों की संख्या के लिहाज से देखें तो यह आंकड़ा अदानी समूह की अंबुजा सीमेंट प्राइवेट लिमिटेड के लिए पुरुँगा क्षेत्र में प्रस्तावित कोयला खदान की तुलना में लगभग तीन गुना अधिक है। इसके बावजूद क्षेत्र में अब तक किसी बड़े विरोध प्रदर्शन या जनआंदोलन की स्थिति सामने नहीं आई है।
प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं वन बल प्रमुख, छत्तीसगढ़ द्वारा जारी पत्र में कर्नाटक पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड, बेंगलुरु के आवेदन पर प्रारंभिक प्रक्रिया आगे बढ़ाने के निर्देश दिए गए हैं। हालांकि विभाग ने यह भी स्पष्ट किया है कि वर्तमान में किसी भी प्रकार के कार्य प्रारंभ करने की अनुमति नहीं दी गई है और परियोजना अभी केवल प्रशासनिक एवं परीक्षण चरण में है।
जानकारी के अनुसार परियोजना से धरमजयगढ़, धरमजयगढ़ कॉलोनी, मेढरमार, तराईमार, बायसी कॉलोनी और बायसी सहित कुल 6 गांव प्रभावित होंगे। इन गांवों के लगभग 128 परिवारों को भविष्य में विस्थापन की स्थिति का सामना करना पड़ सकता है।
लेकिन सबसे अधिक चर्चा जिस बात को लेकर हो रही है, वह है क्षेत्र में बना असामान्य सन्नाटा। धरमजयगढ़ क्षेत्र में पूर्व में कई परियोजनाओं को लेकर अपेक्षाकृत कम प्रभावों पर भी तीव्र विरोध प्रदर्शन देखने को मिल चुके हैं, लेकिन इस बार 12 हजार से अधिक पेड़ों की कटाई और 128 परिवारों के संभावित विस्थापन के बावजूद माहौल शांत दिखाई दे रहा है।
स्थानीय स्तर पर कुछ लोग इसकी एक बड़ी वजह बदलती सोच को भी मान रहे हैं। लोगों के बीच यह धारणा बनती दिखाई दे रही है कि यदि देश को बिजली चाहिए, सड़क चाहिये, रोजगार, उद्योग चाहिए और विकास चाहिए, तो उसके बदले कुछ न कुछ कीमत चुकानी ही पड़ेगी चाहे वह जमीन हो, जंगल हो या पेड़ों की बलि। क्योंकि ऊर्जा आज देश की मूल आवश्यकता बन चुकी है और ऊर्जा के बिना बड़े विकास कार्यों की कल्पना संभव नहीं मानी जा रही।
हालांकि इसके साथ ही यह सवाल भी बना हुआ है कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन आखिर कैसे कायम किया जाएगा। क्या हजारों पेड़ों की कटाई और ग्रामीणों के विस्थापन के बदले प्रभावित परिवारों को पर्याप्त पुनर्वास और भविष्य की सुरक्षा मिल पाएगी? क्या पर्यावरणीय क्षति की भरपाई संभव हो सकेगी? आने वाले समय में यही प्रश्न इस परियोजना की दिशा और जनस्वीकृति तय कर सकते हैं।

About The Author

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

[join_button]
WhatsApp