धरमजयगढ़ में विकास पर राजनीति भारी? गुटबाजी के सियासी खेल में कहीं जनता तो नहीं पिस रही !
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धरमजयगढ़ – नगर का विकास किसी दल, गुट या व्यक्ति की निजी प्राथमिकता नहीं, बल्कि जनता की बुनियादी जरूरत और सामूहिक जिम्मेदारी है। लेकिन धरमजयगढ़ में हालिया राजनीतिक घटनाक्रम के बीच जिस तरह गुटबाजी और नगर विकास के बीच संबंधों के आरोप सामने आए हैं, उसने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—क्या धरमजयगढ़ के नगर विकास पर राजनीति हावी हो रही है?
मामला एक राजनीतिक बैठक में युवा मोर्चा पदाधिकारियों की कथित गैरहाजिरी को लेकर शुरू हुआ। इसके बाद भाजपा मीडिया प्रभारी की ओर से खबर को गलत बताते हुए बयान आया। फिर दूसरे पक्ष ने उसी बयान पर तथ्यों का हवाला देते हुये सवाल खड़े किए और बात यहां तक पहुंच गई कि भाजपा की कथित गुटबाजी को नगर विकास में अवरोध बताया गया।
अब सवाल यह नहीं कि राजनीतिक संगठन के भीतर किसकी मौजूदगी थी और किसकी नहीं। सवाल इससे कहीं बड़ा है—क्या आपसी राजनीतिक खींचतान का असर धरमजयगढ़ के विकास पर भी पड़ रहा है?
राजनीति में मतभेद स्वाभाविक हैं। विचार अलग हो सकते हैं, नेतृत्व को लेकर असहमति हो सकती है और संगठन के भीतर अलग-अलग राय भी हो सकती है। लेकिन जब यही मतभेद सड़क, नाली, बिजली, स्वच्छता, पेयजल, नगर की मूलभूत सुविधाओं और विकास योजनाओं जैसे जनहित के मुद्दों तक पहुंचने लगें, तो इसका खामियाजा किसी राजनीतिक गुट को नहीं, बल्कि आम जनता को भुगतना पड़ता है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि नगर विकास की प्राथमिकता तय करते समय क्या जनता आगे है या राजनीति?
क्या किसी योजना का समर्थन इसलिए किया जाता है क्योंकि उससे जनता को लाभ होगा, या इसलिए कि उसका श्रेय किसे मिलेगा? क्या किसी विकास कार्य का विरोध उसके औचित्य के कारण होता है, या इसलिए कि उसका राजनीतिक लाभ दूसरे पक्ष को मिल सकता है? क्या विकास कार्यों पर भी गुटीय नजरिया हावी होने लगा है?
इन सवालों का जवाब राजनीतिक दलों और स्थानीय नेतृत्व को देना चाहिए।
जनता को यह जानने में कोई दिलचस्पी नहीं कि कौन-सा नेता किस खेमे में है। कौन किससे नाराज है और कौन किससे खुश ?
जनता को सड़क चाहिए, नाली चाहिए, साफ-सफाई चाहिए, बेहतर रोशनी चाहिए, पेयजल चाहिए और ऐसा नगर चाहिए जहां विकास कागजों और राजनीतिक बयानबाजी से निकलकर जमीन पर दिखाई दे।
विकास का श्रेय किसे मिलेगा, यह बाद का सवाल है; विकास होगा या नहीं, यह असली सवाल है।
यदि किसी दल में राजनीतिक मतभेद हैं तो उन्हें संगठन के भीतर बैठकर सुलझाया जाना चाहिए। लेकिन यदि सार्वजनिक रूप से ही यह आरोप लगने लगे कि गुटबाजी नगर विकास में बाधक बन रही है, तो यह केवल किसी राजनीतिक दल का अंदरूनी मामला नहीं रह जाता। यह सीधे जनता के हित से जुड़ जाता है।
और यही वह बिंदु है जहां राजनीतिक नेतृत्व की परीक्षा होती है।
क्या नेता अपने-अपने खेमे से ऊपर उठकर धरमजयगढ़ के हित को प्राथमिकता देंगे? क्या विकास के मुद्दों पर राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के बजाय स्वस्थ प्रतिस्पर्धा होगी? क्या यह तय होगा कि नगर का विकास किसी एक गुट की उपलब्धि नहीं, बल्कि पूरे नगर की जरूरत है?
क्योंकि धरमजयगढ़ की जनता को गुटों की जीत नहीं, विकास की जीत चाहिए।
राजनीति आती-जाती रहेगी, नेता बदलते रहेंगे, पद और जिम्मेदारियां भी बदलती रहेंगी। लेकिन विकास की गति रुक गई तो उसका नुकसान वर्षों तक जनता को उठाना पड़ेगा।
इसलिए आज सबसे बड़ा सवाल किसी एक नेता, एक गुट या एक पार्टी से नहीं, बल्कि पूरे स्थानीय राजनीतिक नेतृत्व से है—
क्या धरमजयगढ़ में राजनीति विकास के लिए हो रही है, या विकास ही राजनीति का शिकार हो रहा है?
यदि इसका जवाब ईमानदारी से खोज लिया जाए, तो शायद नगर की कई समस्याओं का समाधान भी अपने आप दिखाई देने लगेगा।

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