वीरांगना रानी दुर्गावती जयंती पर ग्रामोदय विश्वविद्यालय में संगोष्ठी आयोजित
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चित्रकूट- 05 अक्टूबर 2026। महात्मा गांधी चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय, रानी दुर्गावती शोध संस्थान तथा इतिहास संकलन समिति महाकौशल प्रांत के संयुक्त तत्वावधान में आज वीरांगना रानी दुर्गावती की जयंती के अवसर पर एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया।

कार्यक्रम की शुरुआत रानी दुर्गावती की प्रतिमा पर भावपूर्ण पुष्पांजलि अर्पित कर की गई। कार्यक्रम का संचालन डॉ. कन्हैयालाल मिश्र ने किया।
संगोष्ठी के प्रारंभ में प्रो. जयशंकर मिश्र ने स्वागत भाषण एवं विषय प्रवेश कराया। उन्होंने कला संकाय के अधिष्ठाता प्रो. कपिल देव मिश्र, प्रो. ललित कुमार सिंह, डॉ. प्रसन्न पाटकर, डॉ. कमलेश थापक, डॉ. राकेश, डॉ. सिद्धार्थ, डॉ. त्रिभुवन सिंह, अतिथि व्याख्याताओं, शोधार्थियों, छात्र-छात्राओं और कर्मचारी बंधुओं का अभिनंदन किया। प्रो. जयशंकर मिश्र ने रानी दुर्गावती को ‘आदिवासियों की रानी’ के रूप में रेखांकित करते हुए उनके द्वारा मुगलों और आक्रांताओं के खिलाफ लड़े गए ऐतिहासिक युद्धों का उल्लेख किया।

सांस्कृतिक विरासत और पूर्वजों का सम्मान
इसके पश्चात प्रो. ललित कुमार सिंह ने रानी दुर्गावती को भारत की सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक बताया। उन्होंने कहा कि रानी दुर्गावती ने अपनी अदम्य वीरता और संघर्ष के बल पर पूरे देश में एक मिसाल कायम की। उन्होंने जोर देकर कहा कि अपने पूर्वजों की विरासत को संरक्षित रखना आज के समय में बेहद महत्वपूर्ण कार्य है।
डाक टिकट और प्रतिमा निर्माण से जुड़े संस्मरण
प्रो. प्रसन्न पाटकर ने रानी दुर्गावती की प्रतिमा निर्माण से जुड़े विशेष संस्मरण साझा किए। उन्होंने बताया कि उनके पिता द्वारा तैयार की गई प्रतिमा का चयन होना पूरे परिवार के लिए अत्यंत गर्व का विषय रहा। उन्होंने रानी दुर्गावती की स्मृति में जारी डाक टिकट और प्रो. कपिल मिश्र के मधुर संबंधों पर भी विचार व्यक्त किए।
हमीरपुर जिले के सरवई गांव का जिक्र करते हुए प्रो. कमलेश थापक ने अपना व्याख्यान शुरू किया। उन्होंने रानी दुर्गावती के विवाह और अकबर के आक्रमण के दौरान राज्य की रक्षा में दिए गए उनके महान त्याग को रेखांकित किया। उन्होंने बताया कि किस तरह रानी दुर्गावती ने अपने पुत्र के बलिदान के बावजूद राज्य की रक्षा की और प्रजा के हित में अनेकों लोक कल्याणकारी कार्य किए।
कला संकाय के अधिष्ठाता प्रो. कपिल देव मिश्र ने अपने व्याख्यान में भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ के विचार पर प्रकाश डाला। उन्होंने रानी दुर्गावती के जन्म, नामकरण और उनके जीवन के सामाजिक समरसता के पहलुओं पर विस्तार से बात की। अबुल फजल का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि इतिहासकार अबुल फजल भी रानी दुर्गावती को ‘सर्वोत्तम रानी’ मानता था। प्रो. मिश्र ने विद्यार्थियों को संदेश देते हुए कहा, “यदि आप चरित्रवान, गुणवान और श्रमशील हैं, तो आपको विद्वान और धनवान होने से कोई नहीं रोक सकता।” उन्होंने सभी से सही इतिहास पढ़ने और पढ़ाने का आह्वान किया।
इतिहास विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. त्रिभुवन सिंह ने धन्यवाद ज्ञापन किया। उन्होंने ‘आईने अकबरी’ का संदर्भ देते हुए रानी दुर्गावती के युद्ध कौशल की सराहना की और बताया कि उनकी ‘गुरिल्ला युद्ध पद्धति’ को आगे चलकर महाराजा छत्रसाल और छत्रपति शिवाजी महाराज ने भी अपनाया। उन्होंने बुंदेलखंड को ‘वीरांगनाओं की धरती’ के रूप में नमन किया।
इस अवसर पर विश्वविद्यालय के विभिन्न विभागों के विभागाध्यक्ष, शोधार्थी, अतिथि व्याख्याता तथा बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं एवं कर्मचारी उपस्थित रहे।

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