व्यवस्था की मजबूती सवाल रोकने में नहीं, कमियां दूर करने में है—पारदर्शिता से बढ़ेगा भरोसा
1 min read

आदिवासी अंचल के आवासीय विद्यालयों और छात्रावासों की व्यवस्थाओं को लेकर विद्यार्थियों की शिकायतों के बीच छत्तीसगढ़ राज्य स्तरीय अधीक्षक संघ द्वारा दिए गए आवेदन ने ‘अनधिकृत निरीक्षण’ को लेकर बहस छेड़ दी है। संघ ने कुछ लोगों पर स्वयं को पत्रकार या मीडिया प्रतिनिधि बताकर छात्रावासों में पहुंचने, निरीक्षण के नाम पर दबाव बनाने और कथित रूप से धनराशि मांगने के आरोप लगाए हैं। यदि ऐसे आरोपों में तथ्य हैं तो उनकी निष्पक्ष जांच और कार्रवाई आवश्यक है।
लेकिन इस पूरे मामले को पारदर्शिता, स्पष्टता और सकारात्मक सुधार के नजरिए से देखना भी उतना ही जरूरी है। कथित वसूली और पत्रकारिता को एक ही नजर से नहीं देखा जाना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति मीडिया की पहचान का गलत इस्तेमाल कर दबाव बनाता है तो वह अलग विषय है, लेकिन किसी संस्था की व्यवस्था पर सवाल उठाना, शिकायतों की पड़ताल करना और कमियों को सामने लाना पत्रकारिता की स्वाभाविक भूमिका है।
आवासीय विद्यालयों और छात्रावासों में यदि भोजन, शिक्षा, उपस्थिति, सुविधाओं या प्रबंधन को लेकर कोई शिकायत सामने आती है तो उसे केवल आलोचना के रूप में देखने के बजाय सुधार के अवसर के रूप में लिया जाना चाहिए। शिकायत सही है तो व्यवस्था में सुधार होगा और गलत है तो तथ्य सामने आने से स्थिति स्पष्ट होगी। दोनों ही परिस्थितियों में पारदर्शिता व्यवस्था के हित में है।
जो अव्यवस्थाएं सामने आ रही हैं, उनसे व्यवस्था को दो-चार होना ही पड़ेगा। आज जो सवाल उठ रहे हैं, उनका जवाब देना होगा और भविष्य में जो कमियां सामने आएंगी, उनका भी समाधान तलाशना होगा। सवालों को रोकने से बेहतर है कि सवालों के कारणों को समझकर व्यवस्था को मजबूत किया जाए।
इसी तरह मीडिया की खबरों को भी केवल नकारात्मक या विरोध के रूप में देखने के बजाय व्यवस्था की कमियों की सूचना और सुधार का माध्यम माना जाना चाहिए। किसी खबर में तथ्यात्मक गलती हो तो उसका स्पष्ट तथ्य और दस्तावेज के साथ जवाब दिया जा सकता है। वहीं यदि खबर किसी वास्तविक कमी की ओर ध्यान दिलाती है तो उसे स्वीकार कर सुधार की दिशा में कदम उठाना ही बेहतर प्रतिक्रिया होगी।
सबसे महत्वपूर्ण बात विद्यार्थियों की है। बच्चे यदि अपनी समस्या सामने रखते हैं तो उनकी आवाज को दबाने के बजाय उनकी शिकायतों को गंभीरता से सुना जाना चाहिए। उनकी बात सही है तो सुधार होना चाहिए और यदि किसी शिकायत में तथ्य नहीं हैं तो जांच के बाद स्थिति स्पष्ट होनी चाहिए। बच्चों की आवाज को समस्या नहीं, बल्कि व्यवस्था को बेहतर बनाने का संकेत माना जाना चाहिए।
आज के दौर में सवालों को पूरी तरह दबाना न व्यावहारिक है और न ही संभव । न छात्र अपनी वास्तविक समस्याओं पर हमेशा चुप बैठेंगे और न मीडिया की आवाज को दबाया जा सकता है। बेहतर रास्ता यही है कि सवालों का सामना स्पष्टता, तथ्यों और पारदर्शिता के साथ किया जाए।
आखिर किसी संस्था की मजबूती इस बात से साबित नहीं होती कि उसके बारे में कितने सवाल नहीं उठे, बल्कि इससे होती है कि सवाल उठने पर उसने कितनी ईमानदारी से उन्हें सुना और कितनी गंभीरता से सुधार किया।
इसलिए मीडिया की खबरों को चुनौती के बजाय सुधार का अवसर और छात्रों की शिकायतों को विरोध के बजाय व्यवस्था की वास्तविक स्थिति समझने का माध्यम माना जाए—यही पारदर्शी और सकारात्मक व्यवस्था की पहचान होगी।
Subscribe to my channel