Recent Posts

July 28, 2026

Udghosh Samay News

खबर जहां हम वहां

पटवारी ने सत्यापित कर दी जाति, आदिवासी को बना दिया ओबीसी ! पांचवीं अनुसूची क्षेत्र में करोड़ों की आदिवासी भूमि पर बड़ा खेल ? 1931 से 2024 तक के राजस्व अभिलेखों में चौंकाने वाले विरोधाभास !

1 min read
Spread the love


धरमजयगढ़ – रायगढ़ जिले के धरमजयगढ़ राजस्व अनुविभाग क्षेत्र में आदिवासी भूमि की सुरक्षा पर एक बार फिर गंभीर प्रश्न खड़े हो गए हैं। ग्राम उदउदा से सामने आया एक राजस्व प्रकरण न केवल अभिलेखों में कथित गड़बड़ियों की ओर संकेत करता है, बल्कि यह भी सवाल खड़ा करता है कि क्या अनुसूचित क्षेत्र में आदिवासी भूमि से जुड़े संवेदनशील मामलों में वैधानिक प्रावधानों का पूरी तरह पालन किया जा रहा है। उपलब्ध राजस्व दस्तावेजों के अध्ययन में कई ऐसे विरोधाभास सामने आए हैं, जिनकी निष्पक्ष एवं उच्च स्तरीय जांच आवश्यक प्रतीत होती है।


राजस्व अभिलेखों के अनुसार वर्ष 1931-32 के मिशल रिकॉर्ड में खसरा नंबर 388/1, कुल 61.45 एकड़ भूमि “घास मद” के रूप में दर्ज है। इसके बाद वर्ष 1954-55 के अधिकार अभिलेख में इसी भूमि से संबंधित खसरा नंबर 388/1छ, कुल 2.830 हेक्टेयर भूमि दमोदर पिता चैतन, जाति गोंड (अनुसूचित जनजाति), निवासी धरमजयगढ़ के नाम दर्ज होना उल्लेखित है। इससे स्पष्ट होता है कि संबंधित भूमि का संबंध मूलतः अनुसूचित जनजाति के भू-स्वामी से रहा है।


विवाद तब गहराता है जब बाद के राजस्व अभिलेखों में इसी भूमि की प्रविष्टियों में परिवर्तन दिखाई देता है। आरोप है कि जाति संबंधी विवरणों में कथित बदलाव के बाद 30 अक्टूबर 2022 को पारित फौती नामांतरण आदेश के आधार पर भुनेश्वर प्रसाद यादव एवं अन्य, निवासी जमरगी डी के नाम प्रविष्टियां दर्ज कर दी गईं। इसके बाद वर्ष 2023-24 के बी-1 अभिलेख में इसी खसरा नंबर की 0.8090 हेक्टेयर भूमि द्रोपदी पति ब्रम्हानंद, जाति उरांव (अनुसूचित जनजाति), निवासी लुडेग के नाम दर्ज होना दर्शाया गया है। एक ही भूमि के संबंध में अलग-अलग समय पर सामने आई इन प्रविष्टियों ने पूरे प्रकरण को संदेह के घेरे में ला दिया है।
इस मामले का सबसे संवेदनशील पक्ष यह है कि संबंधित भूमि पांचवीं अनुसूची के अंतर्गत अधिसूचित क्षेत्र में स्थित है, जहाँ अनुसूचित जनजातियों की भूमि की सुरक्षा के लिए विशेष संवैधानिक एवं वैधानिक प्रावधान लागू हैं। ऐसे में सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि यदि मूल अभिलेखों में भूमि अनुसूचित जनजाति के व्यक्ति के नाम दर्ज थी, तो उसका नामांतरण किन परिस्थितियों, किन दस्तावेजों और किस विधिक प्रक्रिया के आधार पर किया गया? क्या नामांतरण से पूर्व मूल अभिलेखों, जाति संबंधी रिकॉर्ड, भू-राजस्व कानूनों तथा सक्षम प्राधिकारी की अनुमति का समुचित परीक्षण किया गया था? यदि राजस्व रिकॉर्ड में परिवर्तन हुआ, तो उसका अधिकृत आधार क्या है?
मामले में एक और गंभीर पहलू सामने आया है। आरोप है कि नामांतरण प्रक्रिया के दौरान संबंधित व्यक्ति की जाति का सत्यापन ऐसे स्वरूप में किया गया, जिससे अनुसूचित जनजाति से जुड़े भूमि संरक्षण संबंधी प्रावधानों के अनुपालन पर भी प्रश्न खड़े हो रहे हैं। यदि जांच में यह तथ्य प्रमाणित होते हैं कि राजस्व अभिलेखों में जाति संबंधी प्रविष्टियों में अनियमित परिवर्तन किया गया अथवा गलत आधार पर सत्यापन हुआ, तो यह केवल अभिलेखीय त्रुटि नहीं बल्कि अनुसूचित क्षेत्र में आदिवासी भूमि की सुरक्षा से जुड़ा अत्यंत गंभीर विषय माना जा सकता है।
सूत्रों के अनुसार इस पूरे प्रकरण में हल्का नंबर 34 के तत्कालीन पटवारी प्रमोद राठिया तथा तत्कालीन तहसीलदार भोज कुमार डहरिया की भूमिका की भी जांच किए जाने की मांग उठ रही है। हालांकि, इन अधिकारियों की ओर से इस संबंध में कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है और आरोपों की पुष्टि सक्षम जांच के बाद ही हो सकेगी।
राजस्व मामलों के जानकारों का मानना है कि यदि इस पूरे प्रकरण की मूल मिशल, अधिकार अभिलेख, बी-1, नामांतरण आदेश, जाति सत्यापन दस्तावेज तथा अन्य राजस्व अभिलेखों की स्वतंत्र एवं उच्च स्तरीय जांच कराई जाती है, तो कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आ सकते हैं। यदि जांच में दस्तावेजों से छेड़छाड़, जाति संबंधी प्रविष्टियों में अनियमित बदलाव अथवा विधिक प्रक्रिया के उल्लंघन की पुष्टि होती है, तो यह मामला केवल एक भूमि विवाद नहीं रहेगा, बल्कि अनुसूचित क्षेत्र में आदिवासी अधिकारों की सुरक्षा, राजस्व प्रशासन की जवाबदेही और सरकारी अभिलेखों की विश्वसनीयता से जुड़ा एक बड़ा प्रकरण साबित हो सकता है।

About The Author

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

[join_button]
WhatsApp