प्राकृतिक खेती प्रकृति से संवाद का माध्यम है: एकेएस विश्वविद्यालय में ‘प्राकृतिक खेती पाठशाला’ का आयोजन
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सतना। जब कृषि केवल उत्पादन का साधन न रहकर प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व का संस्कार बन जाए, तब धरती की उर्वरता, किसान की समृद्धि और मानव स्वास्थ्य का संतुलन स्वतः स्थापित होने लगता है। इसी विचार को केंद्र में रखते हुए नैक एक्रेडिटेड एवं यूजीसी से मान्यता प्राप्त एकेएस विश्वविद्यालय, सतना में भारतीय जनता पार्टी तथा कृषि एवं किसान कल्याण विभाग, मध्यप्रदेश शासन के अंतर्गत संचालित आत्मा (ATMA) परियोजना के संयुक्त तत्वावधान में ‘प्राकृतिक खेती पाठशाला’ का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में जिले के लगभग 275 कृषकों ने सहभागिता कर प्राकृतिक कृषि के वैज्ञानिक, आर्थिक एवं पर्यावरणीय आयामों पर गहन जानकारी प्राप्त की।

कार्यक्रम में वक्ताओं ने कहा कि प्राकृतिक खेती केवल एक कृषि तकनीक नहीं, बल्कि धरती, जल, जीव-जंतु और मानव जीवन के मध्य संतुलित संबंधों को पुनर्स्थापित करने का एक जनांदोलन है। रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों पर बढ़ती निर्भरता के बीच प्राकृतिक खेती किसानों को कम लागत, अधिक टिकाऊ और पर्यावरण-अनुकूल विकल्प प्रदान करती है। मुख्य अतिथि सतना महापौर श्री योगेश ताम्रकार ने कहा कि प्राकृतिक खेती आत्मनिर्भर कृषि व्यवस्था की आधारशिला है। यह न केवल मिट्टी की उर्वरता को संरक्षित करती है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित और स्वस्थ भविष्य का मार्ग भी प्रशस्त करती है।

इस अवसर पर एकेएस विश्वविद्यालय के चेयरमैन इंजी. अनंत कुमार सोनी, प्रो-वाइस चांसलर (डेवलपमेंट) डॉ. हर्षवर्धन श्रीवास्तव, कुलपति डॉ. बी. ए. चोपड़े तथा कृषि संकाय के अधिष्ठाता डॉ. ए. के. भौमिक की गरिमामयी उपस्थिति रही। विश्वविद्यालय प्रशासन ने कहा कि उच्च शिक्षण संस्थानों का दायित्व केवल ज्ञान प्रदान करना नहीं, बल्कि समाज और कृषि क्षेत्र की वास्तविक चुनौतियों के समाधान में सक्रिय भागीदारी निभाना भी है। प्राकृतिक खेती पर केंद्रित यह पहल इसी सामाजिक दायित्व का विस्तार है।

कृषि संकाय के अधिष्ठाता डॉ. ए. के. भौमिक ने अपने व्याख्यान में प्राकृतिक खेती की वैज्ञानिक पृष्ठभूमि, जैविक संसाधनों के प्रभावी उपयोग, मृदा स्वास्थ्य संरक्षण तथा कृषि लागत में कमी के व्यावहारिक उपायों पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि स्वस्थ मिट्टी ही स्वस्थ फसल और स्वस्थ समाज की आधारशिला है। कार्यक्रम में श्री शैलेन्द्र सिंह (मुख्य कार्यपालन अधिकारी, जिला पंचायत), श्रीमती विमला पाण्डेय, डॉ. नवीन शर्मा, श्री प्रवल श्रीवास्तव, डॉ. कृष्णा पाण्डेय, श्री जे.पी. गुप्ता, श्रीमती सुष्मिता सिंह परिहार, श्री पंकज शर्मा, श्री जलज गौतम, श्री प्रिंस पाण्डेय एवं श्री सौरभ त्रिपाठी सहित अनेक कृषि विशेषज्ञ, जनप्रतिनिधि और गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।

विश्वविद्यालय की ओर से डॉ. नीरज वर्मा, डॉ. डी.पी. चतुर्वेदी, डॉ. अनुपम सिंह, डॉ. डूमर सिंह तथा श्री अनूप शुक्ला की सक्रिय सहभागिता रही।
कार्यक्रम के दौरान जिले के प्रगतिशील कृषकों ने अपने अनुभव साझा किए तथा कृषि क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने वाले किसानों को सम्मानित किया गया। किसानों ने प्राकृतिक खेती को समय की आवश्यकता बताते हुए इसे व्यापक स्तर पर अपनाने का संकल्प व्यक्त किया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ. आशीष पाण्डेय (उप संचालक कृषि) एवं भाजपा जिला अध्यक्ष श्री भगवती शरण पाण्डेय ने की। संचालन श्री अयोध्या प्रसाद पाण्डेय ने किया, जबकि संपूर्ण कार्यक्रम के सफल समन्वय का दायित्व आत्मा परियोजना की जिला समन्वयक श्रीमती अलका शुक्ला ने निभाया।
अंत में उपस्थित सभी कृषकों, विशेषज्ञों एवं अतिथियों ने यह विश्वास व्यक्त किया कि प्राकृतिक खेती केवल कृषि सुधार का माध्यम नहीं, बल्कि प्रकृति और मानव के बीच टूटते संबंधों को पुनः सशक्त बनाने की दिशा में एक सार्थक पहल है।
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