ए.के.एस. विश्वविद्यालय कृषि प्रक्षेत्र में धान की सीधी बुवाई।डीएसआर तकनीक, डायरेक्ट सीडेड राइस तकनीक किसानों के लिए लाभकारी: डॉ. डी. पी. चतुर्वेदी
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सतना । ए.के.एस. विश्वविद्यालय, सतना के कृषि संकाय अंतर्गत कृषि शस्य विज्ञान (एग्रोनॉमी) विभागाध्यक्ष डॉ. डी. पी. चतुर्वेदी ने किसानों को धान उत्पादन में डायरेक्ट सीडेड राइस तकनीक अपनाने की सलाह दी है। उन्होंने बताया कि यह आधुनिक कृषि तकनीक पानी, श्रम और उत्पादन लागत में कमी लाने के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

डॉ. चतुर्वेदी ने कहा कि डीएसआर पद्धति में धान की नर्सरी तैयार करने तथा पौध रोपाई की आवश्यकता नहीं होती। इसमें धान के बीजों को सीधे मुख्य खेत में बोया जाता है, जिससे पारंपरिक रोपाई विधि की तुलना में लगभग 30 से 60 प्रतिशत तक पानी की बचत होती है। इस तकनीक से प्रति एकड़ 15 से 25 लाख लीटर तक पानी बचाया जा सकता है। साथ ही, नर्सरी तैयार करने, पौध उखाड़ने और रोपाई में लगने वाले श्रम की आवश्यकता कम होने से प्रति एकड़ लगभग 60 घंटे तक श्रम की बचत होती है।
उन्होंने बताया कि डीएसआर तकनीक पर्यावरण के अनुकूल है क्योंकि इससे मीथेन गैस का उत्सर्जन 30 से 50 प्रतिशत तक कम होता है। इसके अलावा, धान की फसल अपेक्षाकृत जल्दी तैयार हो जाती है, जिससे किसान समय पर अगली फसल की बुवाई कर सकते हैं।

लगातार पडलिंग न होने के कारण मिट्टी की भौतिक संरचना भी सुरक्षित रहती है और भूमि की उर्वरता पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
डॉ. चतुर्वेदी के अनुसार डीएसआर की बुवाई मुख्य रूप से दो तरीकों से की जाती है। पहला, ट्रैक्टर संचालित सीड ड्रिल या जीरो टिल सीड ड्रिल के माध्यम से मशीनी बुवाई, जो सबसे वैज्ञानिक एवं लोकप्रिय विधि है। दूसरा, छिटकवां विधि, जिसमें बीजों को खेत में समान रूप से बिखेरकर मिट्टी में मिला दिया जाता है।
उन्होंने किसानों को आगाह करते हुए कहा कि डीएसआर तकनीक की सफलता के लिए खरपतवार प्रबंधन अत्यंत आवश्यक है। बुवाई से पहले खेत का समतलीकरण करें तथा बुवाई के तुरंत बाद प्री-इमरजेंस और 20 से 25 दिन बाद पोस्ट-इमरजेंस खरपतवारनाशकों का उपयोग कृषि विशेषज्ञों की सलाह अनुसार करें। सिंचाई प्रबंधन पर विशेष ध्यान देते हुए पहली सिंचाई बुवाई के लगभग 20 से 25 दिन बाद करनी चाहिए तथा बाद में आवश्यकता के अनुसार सिंचाई करनी चाहिए।
डॉ. चतुर्वेदी ने बताया कि डीएसआर के लिए 20 मई से 30 जून तक का समय उपयुक्त माना जाता है। मशीन द्वारा बुवाई करने पर प्रति एकड़ 8 से 10 किलोग्राम बीज पर्याप्त रहता है। उन्होंने किसानों से जल संरक्षण, लागत में कमी और अधिक लाभ प्राप्त करने के लिए डीएसआर तकनीक को अपनाने का आह्वान किया।
उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में जल संकट और बढ़ती कृषि लागत को देखते हुए डीएसआर तकनीक धान उत्पादन के लिए एक प्रभावी एवं टिकाऊ विकल्प के रूप में उभर रही है, जिससे किसानों की आय बढ़ाने में मदद मिल सकती है।
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