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August 22, 2026

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अजोला : उत्तम जैव उर्वरक एवं पशु आहार का प्रभावी विकल्प
डॉ. वासुदेव द्विवेदी, एग्रोनॉमी वैज्ञानिक, ए.के.एस. विश्वविद्यालय ने दी महत्वपूर्ण जानकारी
सतना।ए.के.एस. विश्वविद्यालय के एग्रोनॉमी वैज्ञानिक डॉ. वासुदेव द्विवेदी ने बताया कि अजोला एक जल फर्न है, जो उत्कृष्ट जैव उर्वरक के रूप में उपयोग किया जाता है। विशेष रूप से धान की खेती में यह मिट्टी में नाइट्रोजन स्थिरीकरण कर भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।


उन्होंने बताया कि अजोला में लगभग साढ़े तीन प्रतिशत नाइट्रोजन सहित अनेक कार्बनिक तत्व पाए जाते हैं, जो फसलों के लिए अत्यंत लाभकारी होते हैं। इसके प्रयोग से धान की फसल के उत्पादन में लगभग 10 से 15 प्रतिशत तक वृद्धि देखी गई है।
डॉ. द्विवेदी ने कहा कि ए.के.एस. विश्वविद्यालय में अजोला का उपयोग मुर्गियों के पूरक आहार के रूप में प्रतिदिन किया जाता है। वहीं गौशाला में भी गायों के भोजन के साथ प्रतिदिन लगभग 100 से 150 ग्राम अजोला भूसे में मिलाकर खिलाया जाता है। इससे गायों का स्वास्थ्य बेहतर रहता है तथा दूध की गुणवत्ता और मात्रा दोनों में वृद्धि होती है।


उन्होंने इसे सस्ती, सरल, टिकाऊ एवं पर्यावरण मित्रवत तकनीक बताया। अजोला उत्पादन की विधि समझाते हुए उन्होंने बताया कि इसके लिए उचित आकार के कच्चे पॉलिथीन युक्त अथवा पक्के गड्ढे तैयार किए जाते हैं। गड्ढों को चूने से पोतकर सूखने के बाद उसमें आधी गहराई तक स्वच्छ मीठा पानी भरा जाता है।


इसके बाद प्रत्येक पिट में लगभग 20 किलोग्राम मिट्टी, 5 किलोग्राम गोबर अथवा वर्मी कम्पोस्ट तथा 3 किलोग्राम सुपर फॉस्फेट डालकर अच्छी तरह मिश्रित किया जाता है। तत्पश्चात उसमें शुद्ध अजोला कल्चर फैलाया जाता है, जो शीघ्रता से बढ़ने लगता है।
डॉ. द्विवेदी ने कहा कि अजोला तकनीक किसानों के लिए कम लागत में अधिक लाभ देने वाली उन्नत एवं उपयोगी पद्धति है, जिसे अपनाकर किसान खेती और पशुपालन दोनों में बेहतर परिणाम प्राप्त कर सकते हैं।

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