पत्थलगांव कथित लूट प्रकरण पर उठे गंभीर सवाल, पत्रकार प्रेम सिंह राजपूत का विस्तृत पक्ष सामने आया
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जशपुर/पत्थलगांव।
पत्थलगांव थाना क्षेत्र से जुड़ी एक खबर में एक पत्रकार पर स्वयं को फूड इंस्पेक्टर बताकर किसान से मारपीट और 50 हजार रुपये की वसूली जैसे गंभीर आरोप लगाए गए थे। अब इस पूरे प्रकरण में पत्रकार प्रेम सिंह राजपूत सामने आए हैं और उन्होंने इन आरोपों को पूरी तरह झूठा, मनगढ़ंत और बदनाम करने के उद्देश्य से गढ़ा गया बताया है।


🆔 “मैं फूड इंस्पेक्टर नहीं, RNI पंजीकृत पत्रकार हूं”
प्रेम सिंह राजपूत ने स्पष्ट किया है कि वे फूड इंस्पेक्टर नहीं हैं, बल्कि RNI (Registrar of Newspapers for India) में पंजीकृत पत्रकार हैं।
उनका कहना है कि उन्हें जानबूझकर एक सरकारी अधिकारी के रूप में पेश कर मामले को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया गया, ताकि उनकी सामाजिक और पत्रकारिक छवि को नुकसान पहुंचाया जा सके।
🚜 किसान नहीं, धान व्यापारी है आरोप लगाने वाला व्यक्ति
प्रेम सिंह राजपूत के अनुसार, जिस व्यक्ति को खबर में गरीब किसान बताया जा रहा है, वह वास्तव में किसान नहीं बल्कि धान का व्यापारी है, जो कमला श्री मिल से धान खरीदकर आगे किसानों को बेचने का कार्य करता है।
इसी व्यापारिक गतिविधि के तहत वह रात के समय पिकअप वाहन से धान का परिवहन कर रहा था।
🕰️ रात 8:30 बजे धान परिवहन पर स्वाभाविक संदेह
घटना के समय रात लगभग 8:30 बजे पिकअप वाहन में धान ले जाया जा रहा था।
सामान्य रूप से किसान अपना धान दिन के उजाले में ही घर या मंडी तक ले जाते हैं। ऐसे में रात के अंधेरे में इस प्रकार का परिवहन होना स्वाभाविक रूप से संदेह पैदा करता है।
इसी संदेह के आधार पर प्रेम सिंह राजपूत द्वारा वाहन को रोककर केवल पूछताछ की गई, न कि किसी प्रकार की धमकी या दबाव बनाया गया।
📞 तहसीलदार और फूड इंस्पेक्टर को सूचना देने का प्रयास, कॉल नहीं हो सका कनेक्ट

माननीय तहसीलदार को कॉल किया गया था उसका स्क्रीनशॉट
प्रेम सिंह राजपूत ने बताया कि मौके पर उन्होंने पत्थलगांव के माननीय तहसीलदार श्री प्राजंल मिश्रा को कॉल के माध्यम से सूचना देने का प्रयास किया, ताकि प्रशासनिक स्तर पर कार्रवाई हो सके।
हालांकि उस समय कॉल कनेक्ट नहीं हो पाया, जिसका स्क्रीनशॉट समाचार के साथ संलग्न किया जा रहा है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि सूचना देने का प्रयास वास्तविक था।

फूड इंस्पेक्टर को भी काल करके सूचना देने का प्रयास किया गया
👥 तीन लोगों के सामने अकेला व्यक्ति कैसे धमका सकता है?
इस मामले में एक और महत्वपूर्ण और तार्किक सवाल सामने आता है।
प्रेम सिंह राजपूत के अनुसार, मौके पर:
- वे अकेले मौजूद थे,
- जबकि पिकअप वाहन में ड्राइवर और मजदूर सहित लगभग तीन लोग सवार थे।
ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि अकेला व्यक्ति तीन लोगों को कैसे धमका सकता है या उनसे जबरन वसूली कैसे कर सकता है?
उनका कहना है कि वे वह से गुजर रहे थे तभी उन्हें रास्ते में धान से लदी गाड़ी दिखी उन्होंने केवल गाड़ी रोकी और अधिकारियों को सूचना देने का प्रयास किया, लेकिन मौके का फायदा उठाकर पिकअप सवार वहां से निकल गए।
❌ लेन-देन, वसूली और मारपीट के आरोपों से स्पष्ट इनकार
प्रेम सिंह राजपूत ने स्पष्ट रूप से कहा है कि:
- न उन्होंने किसी प्रकार की 50,000 रुपये की मांग की,
- न कोई नकद या ऑनलाइन लेन-देन हुआ,
- न ही किसी तरह की मारपीट या धमकी दी गई।
- कमला श्री रइस मिल जो की पालीडीह में स्थित है शाम को करीब 7:30 बजे शाम को CCTV फुटेज की जांच की जाए और धर्मकटा में जो कॉल होता है गाड़ीका उसकी भी जांच की जाए
उनका कहना है कि अधिकारियों को सूचना देने के प्रयास को ही तोड़-मरोड़कर वसूली की कहानी बना दिया गया।
🚔 पहले भी अवैध परिवहन के खिलाफ कार्रवाई में निभाई भूमिका
प्रेम सिंह राजपूत ने यह भी बताया कि इससे पहले भी उन्होंने:
- धान से लदी एक पिकअप पकड़वाने में सहयोग किया,
- लकड़ी से लदी पिकअप की सूचना संबंधित विभाग को दी,
और वे लगातार अवैध परिवहन की जानकारी अधिकारियों तक पहुंचाते रहे हैं।
उनके अनुसार यह कार्य उन्होंने एक जिम्मेदार नागरिक और पत्रकार होने के नाते किया है।
⚠️ सवाल उठाने की कीमत?
प्रेम सिंह राजपूत का कहना है कि जब भी किसी संदिग्ध या अवैध गतिविधि पर सवाल उठाया जाता है, तो कई बार सवाल उठाने वाले को ही झूठे आरोपों में फंसाने का प्रयास किया जाता है।
इस प्रकरण में भी वे स्वयं को इसी तरह के दबाव और बदनामी का शिकार बता रहे हैं।
⚖️ निष्पक्ष जांच की मांग
पत्रकार प्रेम सिंह राजपूत ने प्रशासन और पुलिस से मांग की है कि:
- धान के स्वामित्व की जांच की जाए,
- रात में परिवहन के कारणों की पड़ताल हो,
- कॉल डिटेल और घटनास्थल की परिस्थितियों की निष्पक्ष जांच की जाए,
ताकि सच्चाई सामने आ सके और किसी निर्दोष व्यक्ति की छवि खराब न हो।
✍️ संपादकीय टिप्पणी
सच्ची पत्रकारिता का अर्थ सवाल उठाना और तथ्य सामने लाना है, न कि बिना जांच किसी को आरोपी बना देना। दोनों पक्षों को सुने बिना निष्कर्ष निकालना पत्रकारिता के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है।
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