स्ट्रॉबेरी की लाभकारी खेती अब विंध्य क्षेत्र में: डॉ अनुपम सिंह।
डॉ अनुपम सिंह, असिस्टेंट प्रोफेसर,ए.के.एस. विश्वविद्यालय, सतना
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सतना। स्ट्रॉबेरी, इस फल की खेती दुनिया भर में व्यापक रूप से की जाती है यह फल अपने स्वाद में औषधि गुणों से भरपूर होने के कारण एक विशेष प्रकार से ख्याति प्राप्त है। किसान इसकी खेती खुले तथा पॉलीहाउस में कर सकते हैं। इनकी खेती मैदानी इलाकों में की जा सकती है। प्रदेश के बेरोजगार युवक एवं युवतियों के लिए आमदनी का एक अच्छा जरिया साबित हो सकता है। क्योंकि यह फसल कम समय मे तैयार हो जाती है। और यह अधिक मुनाफा देने वाली फसल है। एक वार्षिक शाकीय फल फसल होने के कारण, इसे किचन गार्डन, टैरेस गार्डन, गमलों आदि में आसानी से उगाया जा सकता है। विगत वर्ष में डॉ अनुपम सिंह के द्वारा उद्यान विभाग, ए. के. एस. विश्वविद्यालय में किए गए शोध कार्य में यह पाया गया है कि स्ट्रॉबेरी की खेती को सतना तथा उसके आसपास के क्षेत्रों में यदि सही प्रजातियों का चयन एवं अच्छा प्रबंधन किया जाए तो इस फल दार पौधों की खेती कर के अच्छा मुनाफा कमाया जा सकता है। इस फसल की खेती करके युवा आत्मनिर्भर बन सकते हैं। स्ट्रॉबेरी की कुछ प्रजातियां जैसे कैमारोजा, स्वीट चार्ली, विंटर डाउन, नबीला, चांडलर, टियागा, टॉरे, सेल्वा, बेलरुबी, फर्न और पजारो हैं। स्ट्राबेरी की दो नई प्रजाति तैयार की जो कि जातोग स्पेशल और शिमला डेलिशियस है यह प्रजाति खाने में बेहद स्वादिष्ट और अधिक उत्पादन देने वाली हैं। इनकी खेती मैदानी इलाकों में की जा सकती है। इसकी खेती के लिए उपयुक्त जल निकास वाली रेतीली दोमट मिट्टी जिसका पी. एच. मान 5.5 से 6.5 हो सर्वोत्तम होती है। इसकी खेती के लिए गोबर की सड़ी हुई खाद 30-40 टन प्रति हेक्टेयर अच्छी तरह से मिट्टी में मिला दें और रासायनिक खाद के प्रयोग से पहले वे अपने निकटतम मृदा स्वास्थ्य परिक्षण प्रयोग शाला, ए. के. एस. विश्वविद्यालय, सतना में जाकर मिटटी की जांच कराएं उसके रिपोर्ट के अनुसार ही नत्रजन फास्फोरस और पोटाश का प्रयोग करें। यदि हमारे किसान भाई रासायनिक उर्वरक के स्थान पर जैव उर्वरक जैसे एजोटोबैक्टर, एजोस्पिरिलम या पी. एस. बी. का प्रयोग करें तो वह एक मृदा स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होगा तथा फसल का उत्पादन भी बढ़ेगा।
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