शासकीय पट्टा जमीन के नामांतरण का खेल बेनकाब!
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धरमजयगढ़ – छाल तहसील के ग्राम सिंगीझाप में शासकीय पट्टा भूमि के नामांतरण का ऐसा मामला सामने आया है, जिसने राजस्व व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। खसरा नंबर 90/2/ज की जमीन को लेकर सामने आए दस्तावेजों में एक ही तहसीलदार के कार्यकाल में दो अलग-अलग आदेश दिखाई देते हैं। पहले आदेश में भूमि को शासकीय पट्टा बताते हुए नामांतरण आवेदन खारिज किया गया, लेकिन करीब तीन महीने बाद उसी भूमि का नामांतरण कर दिया गया।

अब मामला सामने आने के बाद प्रशासन ने विवादित नामांतरण को निरस्त कर भूमि को दोबारा शासकीय खाते में दर्ज कराने की प्रक्रिया शुरू कर दी है।
पहले कहा—शासकीय पट्टा, बाद में बदल गया फैसला
इस पूरे प्रकरण में सबसे चौंकाने वाला तथ्य आदेशों के बीच का अंतर है। उपलब्ध दस्तावेजों के मुताबिक पहले संबंधित राजस्व प्रकरण में भूमि की प्रकृति को शासकीय पट्टा माना गया और इसी आधार पर नामांतरण आवेदन खारिज कर दिया गया था।
लेकिन इसके लगभग तीन महीने बाद उसी भूमि के संबंध में नामांतरण आदेश जारी हो गया। यानी जिस जमीन को पहले सरकारी पट्टा भूमि माना गया था, वही जमीन कुछ ही समय बाद नामांतरण के योग्य कैसे हो गई—यह प्रकरण का सबसे अहम बिंदु बन गया।
मामला सार्वजनिक होने के बाद प्रशासन ने जांच शुरू की और अब विवादित नामांतरण को ही निरस्त करने की दिशा में कार्रवाई आगे बढ़ाई जा रही है।
जांच रिपोर्ट ऊपर भेजी, पुनर्विलोकन की अनुमति का इंतजार
मामले की जांच कर रहे छाल तहसीलदार लोमस कुमार मिरी ने बताया कि प्रकरण का परीक्षण कर जांच प्रतिवेदन उच्च अधिकारियों को भेजा जा चुका है। विवादित नामांतरण के पुनर्विलोकन के लिए सक्षम प्राधिकारी से अनुमति मांगी गई है।

तहसीलदार के मुताबिक अनुमति प्राप्त होते ही विधिसम्मत प्रक्रिया के तहत नामांतरण निरस्त किया जाएगा और संबंधित भूमि को नियमों के अनुसार पुनः शासकीय मद में दर्ज कराया जाएगा।
सरकारी जमीन के रिकॉर्ड में बदलाव ने बढ़ाई गंभीरता
यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि विवादित भूमि सामान्य निजी भूमि नहीं, बल्कि शासकीय पट्टा भूमि से जुड़ी बताई जा रही है। ऐसे में राजस्व अभिलेखों में नामांतरण के माध्यम से भूमि की स्थिति बदलने की प्रक्रिया कई गंभीर सवालों को जन्म देती है।
एक ओर पुराने आदेश में जमीन को शासकीय पट्टा मानकर नामांतरण से इनकार किया गया, वहीं दूसरी ओर कुछ ही समय बाद नामांतरण आदेश जारी हो गया। अब प्रशासन स्वयं उस नामांतरण को निरस्त कर जमीन को सरकारी खाते में वापस दर्ज कराने की प्रक्रिया में है।
अब सामने आएगा पूरा रिकॉर्ड
प्रशासनिक कार्रवाई आगे बढ़ने के साथ इस प्रकरण में यह स्पष्ट होना महत्वपूर्ण होगा कि पहले नामांतरण आवेदन को किस आधार पर खारिज किया गया था, बाद में किन दस्तावेजों और परिस्थितियों के आधार पर नामांतरण आदेश जारी हुआ और राजस्व अभिलेखों में बदलाव की पूरी प्रक्रिया किस तरह पूरी की गई।
फिलहाल प्रशासन ने विवादित नामांतरण को पलटने की दिशा में कदम बढ़ा दिया है। यदि भूमि को पुनः शासकीय मद में दर्ज किया जाता है, तो यह कार्रवाई शासकीय पट्टा भूमि के नामांतरण से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक कदम मानी जाएगी।
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