भाजपा नेता की त्वरित प्रतिक्रिया पर कांग्रेस नेता की चुटकी—काश यही तत्परता विकास और संगठन में अनुशासन पर भी दिखती !
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धरमजयगढ़ – भाजपा के कथित अंदरूनी मतभेद और अनुशासन को लेकर शुरू हुई राजनीतिक बहस अब एक नए मोड़ पर पहुंच गई है। कांग्रेस नेता द्वारा भाजपा के संगठनात्मक अनुशासन पर सवाल उठाए जाने के बाद भाजपा के एक स्थानीय कद्दावर नेता ने कांग्रेस को पहले अपना घर देखने की नसीहत दी। भाजपा नेता की इस त्वरित प्रतिक्रिया पर अब कांग्रेस जिला महासचिव राजीव अग्रवाल ने चुटकी लेते हुए कहा कि काश विपक्ष को जवाब देने में दिखाई जा रही यही तत्परता पार्टी के भीतर उठ रहे सवालों और नगर विकास के मुद्दों पर भी दिखाई देती।

दरअसल, कांग्रेस नेता ने सवाल उठाया था कि यदि भाजपा के ही एक स्थानीय सक्रिय कार्यकर्ता द्वारा पार्टी के अंदरूनी कलह और गुटबाजी की बातें सार्वजनिक रूप से सामने लाई गई हैं, तो पार्टी संगठन ने अब तक उनके खिलाफ कोई कार्रवाई क्यों नहीं की? इसी संदर्भ में उन्होंने भाजपा के कथित अनुशासन पर सवाल खड़ा करते हुए कहा था कि क्या संगठन का अनुशासन केवल छोटे और जमीनी कार्यकर्ताओं के लिए है, जबकि रसूखदारों के मामले में वही अनुशासन नरम पड़ जाता है?
इस टिप्पणी पर भाजपा के स्थानीय कद्दावर नेता ने कांग्रेस को नसीहत देते हुए कहा कि उसे पहले अपना घर देखना चाहिए।
यही त्वरित प्रतिक्रिया अब कांग्रेस के निशाने पर है।
कांग्रेस जिला महासचिव राजीव अग्रवाल ने भाजपा नेता की प्रतिक्रिया पर चुटकी लेते हुए कहा कि विपक्ष की बात पर तत्काल प्रतिक्रिया देने की यह तत्परता देखकर अच्छा लगा, लेकिन काश भाजपा नेतृत्व की यही तत्परता अपने संगठन के भीतर उठ रहे सवालों का जवाब देने, अनुशासन के कथित दोहरे मापदंड को स्पष्ट करने और नगर विकास से जुड़े सवालों पर जवाब देने में भी दिखाई देती।
राजीव अग्रवाल का तर्क है कि विपक्ष का काम ही सत्ता पक्ष और सत्तारूढ़ राजनीतिक व्यवस्था की कमियों पर सवाल उठाना है। यदि कांग्रेस ने भाजपा के अंदरूनी अनुशासन और गुटबाजी को लेकर सवाल उठाया है, तो उसका जवाब कांग्रेस की कमियां गिनाकर देने के बजाय भाजपा को अपने संगठन की स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
यहां सवाल कांग्रेस बनाम भाजपा से कहीं आगे निकल जाता है। यदि भाजपा के भीतर से ही कोई सक्रिय कार्यकर्ता सार्वजनिक रूप से गुटबाजी और अंदरूनी कलह की बात कहता है, तो संगठन के सामने दो विकल्प हैं—या तो आरोपों को तथ्यहीन बताकर स्पष्ट जवाब दे, या फिर संगठनात्मक स्तर पर मामले की जांच कर वास्तविक स्थिति सामने रखे।
लेकिन यदि सवाल उठाने वाले अपने ही कार्यकर्ता पर कार्रवाई नहीं होती और दूसरी ओर विपक्ष द्वारा इसी मुद्दे पर सवाल पूछे जाने पर तत्काल प्रतिक्रिया सामने आ जाती है, तो अनुशासन के पैमाने को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।
यही वह बिंदु है जहां कांग्रेस नेता की चुटकी राजनीतिक कटाक्ष से आगे जाकर संगठनात्मक जवाबदेही का सवाल बन जाती है।
क्या अनुशासन की कसौटी सबके लिए एक जैसी है?
क्या संगठन के भीतर असहमति रखने वाले प्रभावशाली लोगों और सामान्य कार्यकर्ताओं के लिए अलग-अलग मापदंड हैं?
और यदि भाजपा अपने संगठन को पूरी तरह अनुशासित मानती है, तो फिर अंदरूनी गुटबाजी के आरोपों पर स्पष्टता क्यों नहीं?
वहीं भाजपा नेता की ओर से कांग्रेस को अपना घर देखने की दी गई नसीहत पर भी राजनीतिक हलकों में यही सवाल उठ रहा है कि विपक्ष के घर की कमियां गिनाने से अपने घर के सवाल खत्म नहीं हो जाते।
लोकतंत्र में विपक्ष का सवाल उठाना उसका अधिकार और जिम्मेदारी दोनों है। सत्ता पक्ष चाहे तो उन सवालों को तथ्यों के साथ खारिज कर सकता है, लेकिन सवाल पूछने वाले को ही कटघरे में खड़ा कर देने से मूल सवाल खत्म नहीं होते।
और शायद इसी वजह से कांग्रेस नेता की यह टिप्पणी अब चर्चा का विषय है—
“विपक्ष की प्रतिक्रिया का जवाब देने में इतनी तत्परता है, काश यही तत्परता विकास, संगठन के अनुशासन और अपनी पार्टी के भीतर उठ रहे सवालों के जवाब देने में भी दिखाई देती।”
अब देखना यह है कि यह राजनीतिक तकरार एक-दूसरे पर आरोप लगाने तक सीमित रहती है या भाजपा वास्तव में अपने संगठन के भीतर उठ रहे सवालों पर तथ्य, अनुशासन और कार्रवाई के साथ अपना पक्ष सामने रखती है।
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