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August 15, 2026

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सिसरिंगा से उठी आवाज अब पहुंचेगी NGT तक! वन क्षेत्र और निर्माण गतिविधियों की होगी पड़ताल !

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हाईवे परियोजनाओं पर पहले भी हुई जांच और कार्रवाई, संयुक्त समितियों ने मौके पर पहुंचकर खंगाले हैं तथ्य


धरमजयगढ़ – भारतमाला परियोजना के अंतर्गत उरगा–पत्थलगांव राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 130A के सिसरिंगा क्षेत्र में वन क्षेत्र में कथित हस्तक्षेप और निर्माण गतिविधियों से सार्वजनिक संपत्तियों को संभावित नुकसान का मामला अब राष्ट्रीय हरित अधिकरण यानी NGT की चौखट तक पहुंचने की संभावना के रूप में सामने आ रहा है। इस संभावना को इसलिए भी गंभीरता से देखा जा रहा है क्योंकि देश में राष्ट्रीय राजमार्ग और NHAI की परियोजनाओं से जुड़े पर्यावरणीय विवाद पहले भी NGT तक पहुंचे हैं, जहां केवल कागजी जवाब-तलब तक मामला सीमित नहीं रहा, बल्कि संयुक्त समितियों से स्थल निरीक्षण और पर्यावरणीय क्षति के आकलन तक की प्रक्रिया अपनाई गई।
इसका एक महत्वपूर्ण उदाहरण Amresh Singh बनाम Union of India एवं अन्य, OA No. 295/2016 है। जम्मू-कश्मीर में उधमपुर–बनिहाल राष्ट्रीय राजमार्ग के चार लेन निर्माण के दौरान पर्यावरणीय मानकों के उल्लंघन और निर्माण मलबे के कथित अनियमित डंपिंग का मामला NGT के सामने आया। NGT के रिकॉर्ड में इसे NHAI और उसके ठेकेदारों से संबंधित पर्यावरणीय मानकों के उल्लंघन का मामला बताया गया है। मामले में पर्यावरणीय क्षति की भरपाई और सुधारात्मक कार्रवाई का प्रश्न भी उठा।
इस प्रकरण में NGT ने पर्यावरण प्रबंधन एवं क्षतिग्रस्त पर्यावरण की बहाली के लिए 129 करोड़ रुपये अलग रखने का निर्देश दिया था। NHAI के हालिया अनुपालन रिकॉर्ड में भी इस 129 करोड़ रुपये की राशि का उल्लेख है और मामला 2026 तक अनुपालन प्रक्रिया में दर्ज है।
एक अन्य महत्वपूर्ण उदाहरण Mohammed Jishar एवं अन्य बनाम Union of India एवं अन्य, OA No. 241/2020 है। यह मामला राष्ट्रीय राजमार्ग-66 के रामनाट्टुकरा से एडप्पल्ली तक के निर्माण/विस्तार से जुड़ा था। आरोप था कि परियोजना को पूर्व पर्यावरणीय स्वीकृति के बिना आगे बढ़ाया जा रहा है। NGT ने मामले की वास्तविक स्थिति जानने के लिए पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के क्षेत्रीय कार्यालय तथा NHAI के अधिकारियों वाली Joint Committee गठित की। समिति को मौके का निरीक्षण करने, परियोजना की जांच करने और उल्लंघन मिलने पर पर्यावरणीय क्षति तथा NHAI से वसूल की जाने वाली पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति का आकलन करने का स्पष्ट निर्देश दिया गया। समिति ने बाद में पूरे संबंधित मार्ग का स्थल निरीक्षण भी किया।
यानी न्यायिक रिकॉर्ड यह दिखाता है कि किसी राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजना को केवल इसलिए पर्यावरणीय जांच से बाहर नहीं रखा जाता कि वह राष्ट्रीय महत्व की परियोजना है। जहां पर्यावरणीय कानूनों के अनुपालन पर गंभीर सवाल उठते हैं, वहां NGT तथ्यात्मक स्थिति जानने के लिए विशेषज्ञ अथवा संयुक्त समिति के माध्यम से जांच करा सकता है।
एक और उल्लेखनीय मामला Prem Mohan Gaur बनाम NHAI का है। इस प्रकरण में राजमार्ग निर्माण के दौरान पेड़ों की कथित अवैध कटाई सहित पर्यावरणीय क्षति के मुद्दे सामने आए। बाद के समीक्षा आदेश में NGT के रिकॉर्ड में NHAI की पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति की जिम्मेदारी का उल्लेख मिलता है।
इन मामलों की रोशनी में सिसरिंगा का सवाल अब केवल यह नहीं रह जाता कि सड़क निर्माण हुआ या नहीं। असली सवाल यह है कि क्या NH-130A के निर्माण के दौरान स्वीकृत वन क्षेत्र, निर्धारित राइट ऑफ वे और वास्तविक निर्माण गतिविधियों के बीच पूर्ण समानता रही? क्या निर्माण एजेंसी ने स्वीकृत सीमाओं एवं पर्यावरणीय शर्तों का पालन किया? क्या निर्माण के दौरान किसी वन क्षेत्र, प्राकृतिक जल निकासी अथवा सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचा? और यदि ऐसा हुआ तो उसकी भरपाई तथा पुनर्स्थापन के लिए क्या कदम उठाए गए?
इन सवालों का जवाब केवल निर्माण एजेंसी या संबंधित विभाग की रिपोर्ट से नहीं, बल्कि स्वतंत्र स्थल निरीक्षण और सरकारी अभिलेखों तथा मौके की वास्तविक स्थिति के मिलान से अधिक विश्वसनीय रूप से सामने आ सकता है।

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