पुरुंगा कोल ब्लॉक की रिपोर्ट में छिपे क्या राज ! दावों की सच्चाई पर होगी अग्निपरीक्षा !
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धरमजयगढ़ – प्रस्तावित पुरुंगा भूमिगत कोयला परियोजना से जुड़ा वन विभाग का प्रतिवेदन क्रमांक 969 अब कई महत्वपूर्ण तथ्यों और सवालों को एक साथ सामने ला रहा है। केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा मांगी गई अतिरिक्त जानकारी के जवाब में वन विभाग ने दावा किया है कि प्रस्तावित इंक्लाइन एवं अधोसंरचना के लिए चिन्हित 9.982 हेक्टेयर वन भूमि में किसी भी प्रकार का अतिक्रमण नहीं पाया गया। सैटेलाइट चित्रों में दिखाई देने वाली सड़क जैसी आकृतियों को केवल पगडंडी तथा निर्माण जैसी संरचनाओं को पौधारोपण की सुरक्षा के लिए बनाई गई अस्थायी झोपड़ी बताया गया है।
प्रतिवेदन में यह भी उल्लेख किया गया है कि लगभग 100.970 हेक्टेयर क्षेत्र में वर्ष 2021-22 में पौधारोपण किया गया था, जिसके कारण सैटेलाइट चित्रों में वृक्ष दिखाई दे रहे हैं। इतना ही नहीं, दस्तावेज़ में यह भी स्वीकार किया गया है कि सैटेलाइट इमेजरी में एक जलाशय दिखाई देता है, जिसके पूर्वी कोने पर लगभग 0.405 हेक्टेयर क्षेत्र में वन अधिकार पट्टा स्वीकृत है और पट्टाधारी द्वारा बनाई गई मेड़ सैटेलाइट चित्रों में दिखाई दे रही है।
यहीं से कई नए प्रश्न जन्म लेते हैं। यदि प्रस्तावित वन भूमि में जलाशय मौजूद है तो क्या भूमिगत खनन का उसके जलस्तर या अस्तित्व पर पड़ने वाले संभावित प्रभाव का विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन किया गया है? यदि किया गया है तो क्या उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक की जाएगी? इसी प्रकार यदि वन विभाग के अनुसार प्रस्तावित क्षेत्र में अतिक्रमण नहीं है, तो क्या पूरे 621.331 हेक्टेयर प्रस्तावित वन क्षेत्र का स्वतंत्र सर्वेक्षण कराया गया था, या यह निष्कर्ष केवल मंत्रालय द्वारा पूछे गए सीमित बिंदुओं के आधार पर दिया गया है?
प्रतिवेदन में पौधारोपण, वन अधिकार पट्टा, पगडंडी और अस्थायी संरचनाओं का उल्लेख तो है, लेकिन इनके समर्थन में जियो-टैग अभिलेख, संयुक्त निरीक्षण प्रतिवेदन, फोटोग्राफ तथा अन्य तकनीकी दस्तावेज़ सार्वजनिक नहीं किए गए हैं। ऐसे में यह स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि क्या मंत्रालय इन स्पष्टीकरणों को पर्याप्त मानकर आगे बढ़ेगा, या फिर पूरे मामले का स्वतंत्र एवं विस्तृत सत्यापन भी कराया जाएगा?
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