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July 9, 2026

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मानसिक स्वास्थ्य : उच्च शिक्षा का नया दायित्व और संवेदनशील परिसर की आवश्यकता

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– डॉ. जय प्रकाश शुक्ल –

उच्च शिक्षा का उद्देश्य केवल विद्यार्थियों को डिग्री प्रदान करना नहीं है, बल्कि उन्हें मानसिक, सामाजिक और नैतिक रूप से सक्षम नागरिक बनाना भी है। आज प्रतिस्पर्धा, कैरियर की अनिश्चितता, पारिवारिक अपेक्षाएँ, सामाजिक दबाव, डिजिटल जीवनशैली और बदलती जीवन परिस्थितियों के कारण विद्यार्थियों में मानसिक तनाव, चिंता और अवसाद जैसी समस्याएँ तेजी से बढ़ रही हैं। ऐसे समय में विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य को शिक्षा व्यवस्था के केंद्र में रखना समय की आवश्यकता बन गया है।
मध्यप्रदेश उच्च शिक्षा विभाग द्वारा विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य एवं कल्याण को लेकर प्रारंभ की गई पहल इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। प्रदेश के विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों में प्राध्यापकों, अधिकारियों और कर्मचारियों को मानसिक स्वास्थ्य संबंधी प्रशिक्षण देकर उन्हें अधिक संवेदनशील बनाने का प्रयास किया जा रहा है। यह पहल इस दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है कि विद्यार्थी अपने जीवन का बड़ा हिस्सा शिक्षण संस्थानों में व्यतीत करते हैं और कठिन परिस्थितियों में सबसे पहले उनका संपर्क अपने शिक्षकों एवं संस्थान से ही होता है।
माननीय सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुरूप मानसिक स्वास्थ्य एवं कल्याण को संस्थागत स्वरूप देना उच्च शिक्षा की बदलती प्राथमिकताओं का परिचायक है। अब यह आवश्यक हो गया है कि प्रत्येक विश्वविद्यालय एवं महाविद्यालय में ऐसा वातावरण विकसित हो, जहाँ विद्यार्थी बिना किसी संकोच के अपनी समस्याएँ साझा कर सकें और उन्हें समय पर उचित मार्गदर्शन एवं परामर्श प्राप्त हो।
नए शैक्षणिक सत्र के इंडक्शन कार्यक्रमों में मानसिक स्वास्थ्य, तनाव प्रबंधन, समय प्रबंधन, भावनात्मक संतुलन, सकारात्मक सोच, जीवन कौशल, साइबर सुरक्षा, एंटी-रैगिंग व्यवस्था और मेंटर-मेंटी प्रणाली जैसे विषयों को शामिल करना विद्यार्थियों के समग्र विकास की दिशा में दूरदर्शी पहल है। इससे विद्यार्थियों में आत्मविश्वास बढ़ेगा और वे चुनौतियों का सामना अधिक संतुलित ढंग से कर सकेंगे।
मानसिक स्वास्थ्य केवल चिकित्सकीय विषय नहीं है, बल्कि यह सामाजिक संवेदनशीलता, संवाद और सहयोग की संस्कृति से भी जुड़ा हुआ है। यदि शिक्षक, कर्मचारी, अभिभावक और विद्यार्थी मिलकर विश्वास, सम्मान और सहयोग का वातावरण तैयार करें, तो अनेक मानसिक समस्याओं को प्रारंभिक स्तर पर ही रोका जा सकता है।
महात्मा गांधी चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय सहित प्रदेश के विभिन्न विश्वविद्यालयों में आयोजित प्रशिक्षण कार्यक्रम इस बात का संकेत हैं कि अब उच्च शिक्षा केवल ज्ञानार्जन तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि विद्यार्थियों के समग्र कल्याण को भी समान महत्व दिया जा रहा है। यह परिवर्तन भविष्य के स्वस्थ, आत्मविश्वासी और जिम्मेदार नागरिकों के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
मानसिक रूप से स्वस्थ विद्यार्थी ही रचनात्मक समाज, सक्षम राष्ट्र और विकसित भारत की मजबूत नींव रख सकते हैं। इसलिए मानसिक स्वास्थ्य को शिक्षा व्यवस्था का अभिन्न अंग बनाना केवल प्रशासनिक दायित्व नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक सामाजिक जिम्मेदारी भी है।

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