आज़ादी के दशकों बाद भी सड़क, बिजली और बुनियादी सुविधाओं से जूझता आदिवासी बाहुल्य गाँव कौवाडाही !
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धरमजयगढ़ – एक ओर देश विकसित भारत के निर्माण का संकल्प लेकर आगे बढ़ रहा है, वहीं धरमजयगढ़ विकासखंड की ग्राम पंचायत पारेमेर का आश्रित ग्राम कौहाड़ाही आज भी विकास की मुख्यधारा से कोसों दूर नजर आता है। घने जंगलों और ऊँचे पहाड़ों के बीच बसे इस आदिवासी बाहुल्य गाँव की तस्वीर सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच गहरी खाई को उजागर करती है।

कोरवा जनजाति के परिवारों की आबादी वाले इस गाँव तक आज भी पहुँचने के लिए न तो पक्की सड़क है और न ही आवागमन के लिए समुचित कच्चा मार्ग। बरसात के मौसम में हालात और अधिक चुनौतीपूर्ण हो जाते हैं। कई परिवार आज भी मिट्टी के कच्चे मकानों में रहने को मजबूर हैं, जबकि बिजली और पेयजल जैसी बुनियादी सुविधाएँ भी पर्याप्त रूप से उपलब्ध नहीं हैं।

सरकारें आदिवासी क्षेत्रों के विकास, सड़क, आवास, शिक्षा, पेयजल और विद्युत जैसी मूलभूत सुविधाओं के लिए हर वर्ष करोड़ों रुपये की योजनाओं और बजट का दावा करती हैं। इसके बावजूद कौहाड़ाही जैसे गाँवों की स्थिति यह सवाल खड़ा करती है कि आखिर विकास की ये योजनाएँ धरातल तक क्यों नहीं पहुँच पा रही हैं? यदि योजनाएँ प्रभावी ढंग से लागू हो रही हैं, तो आज भी आदिवासी परिवार मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष करने को क्यों विवश हैं?
गाँव में शिक्षा के नाम पर केवल एक प्राथमिक शाला संचालित है, जिसका संचालन आंगनबाड़ी भवन में किया जा रहा है। इससे स्पष्ट है कि दूरस्थ क्षेत्रों में शिक्षा और आधारभूत सुविधाओं को लेकर अभी भी गंभीर प्रयासों की आवश्यकता है।
कौहाड़ाही की तस्वीर केवल एक गाँव की कहानी नहीं, बल्कि उन दूरस्थ आदिवासी अंचलों की वास्तविकता है जो आज भी विकास की दौड़ में पीछे छूट गए हैं। जब तक सड़क, बिजली, पेयजल, आवास और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा जैसी मूलभूत सुविधाएँ इन अंतिम छोर के गाँवों तक नहीं पहुँचतीं, तब तक विकास के बड़े-बड़े दावे अधूरे ही माने जाएंगे।
ग्रामीणों को उम्मीद है कि शासन-प्रशासन कौहाड़ाही जैसे उपेक्षित गाँवों की ओर गंभीरता से ध्यान देगा और उन्हें भी विकास की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए ठोस एवं समयबद्ध कदम उठाएगा।
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