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June 24, 2026

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3.89 लाख भुगतान विवाद में उठे कई गंभीर सवाल, क्या बिना भौतिक सत्यापन और बिल के हो गया भुगतान ?

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धरमजयगढ़ – नगर पंचायत धरमजयगढ़ में वार्ड क्रमांक 08 में प्रस्तावित आरसीसी नाली निर्माण कार्य से जुड़े ₹3,89,668 के भुगतान विवाद ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक ओर नगर पंचायत द्वारा संबंधित व्यक्ति पर श्रमक जानकारी देकर राशि आहरित कराने का आरोप लगाया गया है, वहीं दूसरी ओर संबंधित व्यक्ति ने पुलिस को दिए आवेदन में दावा किया है कि उसने न तो कोई अनुबंध किया, न कोई बिल प्रस्तुत किया और न ही भुगतान की कोई मांग की।
इस पूरे मामले में अब सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि आखिर भुगतान प्रक्रिया किन आधारों पर पूरी की गई। यदि संबंधित व्यक्ति के दावे सही हैं तो क्या नगर पंचायत ने भुगतान जारी करने से पहले कार्य का भौतिक सत्यापन कराया था? क्या निर्माण कार्य वास्तव में धरातल पर हुआ था अथवा नहीं? यदि कार्य हुआ था तो उसकी माप पुस्तिका, गुणवत्ता परीक्षण और सत्यापन किस अधिकारी द्वारा किया गया?
मामले में यह प्रश्न भी महत्वपूर्ण हो गया है कि क्या किसी ठेकेदार अथवा कार्य निष्पादक द्वारा नगर पंचायत को विधिवत बिल प्रस्तुत किया गया था? यदि बिल प्रस्तुत हुआ था तो वह किसके नाम से था, उस पर किसके हस्ताक्षर थे और भुगतान स्वीकृति की प्रक्रिया किस स्तर पर पूरी की गई? वहीं यदि बिल प्रस्तुत नहीं किया गया था तो फिर लाखों रुपये की राशि खाते में जमा होने की प्रशासनिक अनुमति कैसे मिली?
आवेदन में यह भी दावा किया गया है कि संबंधित व्यक्ति को उसके खाते में राशि जमा होने की कोई पूर्व सूचना नहीं दी गई। ऐसे में यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या नगर पंचायत के जिम्मेदार अधिकारी और कर्मचारी बिना आवश्यक दस्तावेजी पुष्टि के केवल मौखिक जानकारी के आधार पर कार्यवाही करते रहे? क्या भुगतान से पहले लाभार्थी अथवा संबंधित व्यक्ति की सहमति और पहचान का सत्यापन किया गया था? क्या सत्यापनकर्ता को कार्य की जानकारी नहीं थी कि कार्य कहाँ से कहाँ तक होना था , क्या सब कुछ वैसा ही किया गया जैसा ठेकेदार ने कहा, ये तमाम प्रश्न मुँहबाये अभी भी खड़े हैं !
स्थानीय स्तर पर चर्चा का विषय यह भी है कि यदि नगर पंचायत के आरोप सही हैं तो संबंधित भुगतान से जुड़े सभी दस्तावेज सार्वजनिक किए जाने चाहिए, वहीं यदि आवेदक के आरोपों में तथ्य पाए जाते हैं तो भुगतान प्रक्रिया में शामिल अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में आ सकती है।
फिलहाल आवेदक ने पुलिस प्रशासन से पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की है। जांच के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि भुगतान प्रक्रिया में वास्तविक चूक कहां हुई, कार्य का भौतिक सत्यापन हुआ था या नहीं, बिल किसने प्रस्तुत किया और आखिर किस आधार पर ₹3.89 लाख की राशि का भुगतान किया गया।

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