काम माँगने वाले मजदूरों को रोजगार नहीं, फिर किसके लिए चल रही मनरेगा? कोयलार में फाइलों में दफन लाखों के काम, जिम्मेदारों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल
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धरमजयगढ़ – महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) का उद्देश्य ग्रामीणों को उनके गांव में ही रोजगार उपलब्ध कराना है, लेकिन ग्राम पंचायत कोयलार में इस योजना का उद्देश्य ही दम तोड़ता नजर आ रहा है। विगत दो माह के दौरान लगभग 70 जॉब कार्डधारी मजदूरों ने रोजगार की मांग की, इसके बावजूद उन्हें काम उपलब्ध नहीं कराया गया। हैरत की बात यह है कि पंचायत में लाखों रुपये के निर्माण और विकास कार्य स्वीकृत एवं लंबित पड़े हैं, फिर भी जिम्मेदारों द्वारा मजदूर नहीं मिलने का तर्क देकर कार्यों को शुरू नहीं किया जा रहा है।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि पंचायत में लंबित कार्यों को शुरू किया जाए तो जमुना, दशमती, नरसिंह, रविलाल, विराट सिंह, सुदर्शन, चुन्नीलाल, पांचो, महाबीर, पूर्णिमा सहित 70 जॉब कार्ड धारी परिजनों सहित लगभग 300 ग्रामीणों को रोजगार मिल सकता है। इसके बावजूद काम मांगने वाले हाथ खाली हैं और विकास कार्य कागजों में कैद होकर रह गए हैं। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि जब मजदूर स्वयं रोजगार मांग रहे हैं तो आखिर मजदूरों की कमी का बहाना किस आधार पर बनाया जा रहा है।
स्थिति इसलिए भी गंभीर है क्योंकि पंचायत में कई मनरेगा कार्य एक-दो महीने से नहीं बल्कि वर्षों से अधर में लटके हुए हैं। कुछ कार्यों को शुरू होने का इंतजार है तो कुछ अधूरे पड़े हैं। बताया जाता है कि कई कार्य पांच-पांच वर्षों से फाइलों, मस्टर रोल और एमबी बुक के बीच दबे हुए हैं। न तो निर्माण कार्य पूरे हो रहे हैं और न ही ग्रामीणों को रोजगार मिल रहा है। परिणामस्वरूप विकास और रोजगार दोनों ही प्रभावित हो रहे हैं।
मनरेगा कानून के तहत रोजगार की मांग करने वाले श्रमिकों को निर्धारित समय सीमा के भीतर काम उपलब्ध कराना अनिवार्य है। यदि रोजगार नहीं दिया जाता तो बेरोजगारी भत्ता देने का भी स्पष्ट प्रावधान है। लेकिन कोयलार में न तो रोजगार दिया जा रहा है और न ही बेरोजगारी भत्ते को लेकर कोई गंभीरता दिखाई देती है। आश्चर्यजनक स्थिति यह है कि इस संबंध में कई मजदूरों के साथ-साथ योजना से जुड़े कर्मी भी स्पष्ट जानकारी देने में असमर्थ दिखाई देते हैं।
कोयलार की मौजूदा स्थिति यह संकेत देती है कि मनरेगा का उद्देश्य रोजगार सृजन और ग्रामीण विकास कम, जबकि कागजी प्रक्रियाओं तक सीमित अधिक होकर रह गया है। जब गांव में काम भी मौजूद है और मजदूर भी तैयार बैठे हैं, तब रोजगार नहीं मिलना व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाता है। यदि समय रहते लंबित कार्यों को शुरू नहीं किया गया और रोजगार मांगने वाले श्रमिकों को काम नहीं मिला, तो यह न केवल मनरेगा कानून की भावना के विपरीत होगा बल्कि ग्रामीणों के अधिकारों का भी सीधा हनन माना जाएगा।
कोयलार में उठ रहे ये सवाल अब जवाब मांग रहे हैं कि आखिर जब काम भी है और काम मांगने वाले मजदूर भी, तब रोजगार क्यों नहीं दिया जा रहा है? क्या मनरेगा का वास्तविक उद्देश्य कहीं सरकारी फाइलों के बोझ तले दबकर रह गया है?
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