सतना। टमाटर की पारंपरिक खेती में विभिन्न कीटों एवं रोगों के प्रकोप के कारण उपज तथा गुणवत्ता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। फल विकृत हो जाते हैं, पीलापन एवं दाग-धब्बे उत्पन्न होते हैं, जिससे किसानों को अपेक्षित बाजार मूल्य नहीं मिल पाता। इन समस्याओं के नियंत्रण हेतु रासायनिक दवाओं का अत्यधिक उपयोग करना पड़ता है, जो मानव स्वास्थ्य एवं पर्यावरण दोनों के लिए हानिकारक सिद्ध हो सकता है।ऐसी स्थिति में नेट हाउस तकनीक एक प्रभावी एवं सुरक्षित विकल्प के रूप में उभरकर सामने आई है। इस संरक्षित पद्धति में टमाटर की खेती करने से पर्ण कुंचन रोग, आगेती एवं पछेती झुलसा सहित अनेक कीटों का प्रकोप उल्लेखनीय रूप से कम हो जाता है। परिणामस्वरूप फसल स्वस्थ रहती है तथा उत्पादन एवं गुणवत्ता में उल्लेखनीय वृद्धि होती है।एकेएस विश्वविद्यालय, सतना में इस वर्ष टमाटर पर किए गए प्रयोगों ने यह प्रमाणित किया है कि नेट हाउस में उगाई गई फसल की उपज पारंपरिक खेती की तुलना में लगभग तीन गुना अधिक प्राप्त हुई, साथ ही फलों की गुणवत्ता भी श्रेष्ठ रही।उक्त जानकारी डॉ. ए.के. भौमिक, संकायाध्यक्ष कृषि विज्ञान संकाय, डॉ. डूमर सिंह, विभागाध्यक्ष पादप रोग विज्ञान विभाग तथा डॉ. मोतीलाल, सह-प्राध्यापक, पादप रोग विज्ञान विभाग द्वारा दी गई।