भारतमाला आर.ओ.डब्ल्यू. विवाद में बड़ा खुलासा!वन अधिकार अधिनियम को खुली चुनौती, नियम-कायदों को किया दरकिनारमंदिर के पुजारी का अधिकार और रोजगार छिना, मौत के साए में जीने को मजबूर परिवार
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धरमजयगढ़ – छत्तीसगढ़ में उरगा–पत्थलगांव भारतमाला सड़क परियोजना को लेकर गंभीर अनियमितताओं के आरोप सामने आए हैं। रायगढ़ जिले के धरमजयगढ़ क्षेत्र स्थित सिसरिंगा घाट में भारतमाला सड़क निर्माण के दौरान निर्धारित राइट ऑफ वे (आर.ओ.डब्ल्यू.) की सीमा से कई मीटर बाहर तक हस्तक्षेप किए जाने का मामला उजागर हुआ है। आरोप है कि सैकड़ों पेड़ों के साथ बंजारी मंदिर की स्थायी संपत्तियों को भी बिना विधिसम्मत प्रक्रिया अपनाए हटाया गया। सबसे गंभीर आरोप यह है कि जिस स्थान पर बाद में सड़क का निर्माण किया गया, वहां वन अधिकार अधिनियम के तहत प्रदत्त व्यक्तिगत वन अधिकार भूमि भी शामिल है।

मामले से जुड़े दस्तावेजों, स्थल की वास्तविक स्थिति तथा निर्माण एजेंसी मेसर्स दिलीप बिल्डकॉन द्वारा हाल ही में अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) को भेजे गए पत्र के आधार पर कई गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। आरोप है कि कंपनी ने ब्लास्टिंग से नुकसान होने की आशंका का हवाला देकर आर.ओ.डब्ल्यू. के बाहर स्थित मंदिर की लाखों रुपये मूल्य की स्थायी संरचनाओं और बहुमूल्य वन संपदा को ध्वस्त कर दिया। यदि यह आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह केवल भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया ही नहीं बल्कि वन अधिकार अधिनियम और अन्य लागू कानूनी प्रावधानों के पालन पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा असर बंजारी मंदिर के पुजारी नरसिंह पिता जीतन के परिवार पर पड़ा है। उन्हें वन अधिकार अधिनियम के तहत वन कक्ष क्रमांक 389 की 0.209 हेक्टेयर भूमि का वन अधिकार पट्टा प्राप्त है। नरसिंह का कहना है कि उनका परिवार पिछले लगभग 50 वर्षों से मंदिर के सामने उसी भूमि पर झोपड़ी बनाकर निवास करता रहा है तथा मंदिर की सेवा ही उनकी आजीविका का एकमात्र साधन रही है।

नरसिंह के अनुसार, प्रारंभ में कंपनी के प्रतिनिधियों ने स्पष्ट रूप से कहा था कि उनकी भूमि सड़क परियोजना में प्रभावित नहीं होगी। किंतु बाद में उसी भूमि पर सड़क का निर्माण कर दिया गया। उनका दावा है कि फॉरेस्ट गार्ड और हल्का पटवारी द्वारा किए गए सीमांकन में लगभग 40 डिसमिल भूमि उनके कब्जे और अधिकार क्षेत्र में होना बताया गया था।

पुजारी की पत्नी ने भी गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि कंपनी के एक अधिकारी प्रदीप सिंह ने पुलिस बल की मौजूदगी में उनकी वन अधिकार पट्टा भूमि पर जबरन निर्माण कार्य कराया। उन्होंने अपने दावे के समर्थन में एक फोटोग्राफ भी उपलब्ध कराया है। परिवार का आरोप है कि उनकी भूमि और आजीविका प्रभावित होने के बावजूद आज तक किसी प्रकार का मुआवजा अथवा वैधानिक लाभ नहीं दिया गया।

परिवार का कहना है कि मंदिर की संपत्तियों के ध्वस्तीकरण और वन अधिकार भूमि पर निर्माण के बाद उनका रोजगार लगभग समाप्त हो चुका है। वर्तमान में वे अत्यंत कठिन परिस्थितियों में जीवनयापन कर रहे हैं और उनका परिवार आर्थिक एवं सामाजिक संकट से जूझ रहा है।

इस पूरे मामले में अब कई अहम प्रश्न उठ रहे हैं—यदि सड़क निर्माण आर.ओ.डब्ल्यू. से बाहर किया गया, तो उसकी अनुमति किसने दी? वन अधिकार पट्टा भूमि पर निर्माण से पहले क्या संबंधित धारक की सहमति ली गई? क्या आवश्यक अधिग्रहण, मुआवजा और वैधानिक प्रक्रियाओं का पालन किया गया? और यदि नहीं, तो इसकी जिम्मेदारी किसकी तय होगी?

धरमजयगढ़ वन मंडल के वनमंडलाधिकारी (डी.एफ.ओ.) जितेन्द्र कुमार उपाध्याय ने कहा है, “इस मामले में उपलब्ध तथ्यों के आधार पर विधिवत जांच कर आवश्यक कार्रवाई की जाएगी।”

अब स्थानीय लोगों की निगाहें जांच पर टिकी हैं। यह मामला केवल निर्माण संबंधी अनियमितता नहीं बल्कि वन अधिकार अधिनियम, भूमि अधिकारों और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़ा एक गंभीर प्रकरण साबित हो सकता है।
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