आधे एकड़ के नाम पर ढाई एकड़ की रजिस्ट्री? अनपढ़ किसान की जमीन सौदे में बड़ा खेल, बैंक स्टेटमेंट खोल सकते हैं पूरा राज ?
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धरमजयगढ़ – रायगढ़ जिले के कापू तहसील अंतर्गत ग्राम रामपुर में जमीन की एक खरीदी-बिक्री ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि गांव के एक अनपढ़ किसान को आधे एकड़ भूमि की रजिस्ट्री का विश्वास दिलाकर उसकी लगभग ढाई एकड़ भूमि का पंजीयन करा लिया गया। अब इस पूरे मामले में पंजीयन प्रक्रिया, भुगतान और दस्तावेजी कार्रवाई को लेकर संदेह गहराता जा रहा है।
ग्राम रामपुर निवासी चन्दनसिंह का कहना है कि गांव के ही रामरतन तिर्की वर्षों से उसकी आधा एकड़ भूमि पर कब्जा कर खेती कर रहे थे। चन्दनसिंह के अनुसार कई वर्ष पहले उसके पिता को इस जमीन के एवज में लगभग 10 हजार रुपये दिए गए थे। बाद में रामरतन ने उसी भूमि को अपने नाम कराने की बात कहकर उसे रजिस्ट्री कार्यालय ले गए। चूंकि चन्दनसिंह पढ़ा-लिखा नहीं है, इसलिए उसे यही बताया गया कि आधा एकड़ भूमि का पंजीयन किया जा रहा है।
लेकिन बाद में जब दस्तावेजों की जानकारी सामने आई तो कथित रूप से पता चला कि आधे एकड़ के बजाय लगभग ढाई एकड़ भूमि का पंजीयन हो चुका है। यह जानकारी मिलने के बाद किसान के होश उड़ गए। उसका स्पष्ट कहना है कि उसने कभी ढाई एकड़ भूमि बेचने की सहमति नहीं दी थी।
मामले का दूसरा और सबसे महत्वपूर्ण पहलू भुगतान से जुड़ा है। पंजीयन दस्तावेजों में दो लाख रुपये का भुगतान चेक के माध्यम से किए जाने का उल्लेख है, जबकि चन्दनसिंह का दावा है कि उसे जमीन के बदले एक भी पैसा प्राप्त नहीं हुआ। यहीं से पूरे मामले में नया मोड़ आ जाता है।
यदि वास्तव में चन्दनसिंह के नाम दो लाख रुपये का चेक जारी किया गया था, तो सबसे बड़ा सवाल यह है कि उस चेक का क्या हुआ? यदि चेक उसे मिला था तो उसने उसे बैंक में जमा क्यों नहीं किया? आखिर कोई आर्थिक रूप से कमजोर किसान अपने नाम जारी दो लाख रुपये के चेक को बिना भुनाए क्यों रखेगा? और यदि चेक उसे मिला ही नहीं, तो फिर दस्तावेजों में भुगतान का उल्लेख किस आधार पर दर्ज किया गया?
जानकारों का मानना है कि इस विवाद की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी बैंक रिकॉर्ड में छिपी हुई है। क्रेता और विक्रेता दोनों के बैंक स्टेटमेंट, चेक की बैंकिंग ट्रेल तथा भुगतान संबंधी अभिलेख पूरी सच्चाई सामने ला सकते हैं। यदि क्रेता के खाते से दो लाख रुपये की राशि निकली है तो वह किस खाते में जमा हुई, इसका पूरा रिकॉर्ड बैंक के पास उपलब्ध होगा। वहीं यदि चेक का भुगतान ही नहीं हुआ या राशि किसी अन्य खाते में चली गई, तो वह तथ्य भी जांच में उजागर हो सकता है।
मामले में कई अन्य विसंगतियां भी सामने आ रही हैं। बताया जा रहा है कि जिस भूमि का पंजीयन हुआ उसका दस्तावेजी बाजार मूल्य चार लाख रुपये से अधिक है, जबकि विक्रय मूल्य मात्र दो लाख रुपये दर्ज किया गया है। इसके अलावा कथित रूप से पंजीयन दस्तावेजों में केवल क्रेता का फोटो दिखाई देता है, जबकि विक्रेता का फोटो नहीं है। यदि यह तथ्य सही पाया जाता है तो पहचान और सत्यापन प्रक्रिया पर भी सवाल उठ सकते हैं।
वहीं राजस्व दस्तावेजों में पटवारी के स्थान पर दयानन्द पैंकरा के हस्ताक्षर होने की बात भी चर्चा का विषय बनी हुई है। स्थानीय सूत्रों के अनुसार दयानन्द पैंकरा पुसौर में उप पंजीयक पदस्थ हैं और किसी प्रशासनिक व्यवस्था के तहत एक दिन के लिए धरमजयगढ़ आए थे। संयोग से उसी दिन इस भूमि का पंजीयन भी संपन्न हुआ। ऐसे में संबंधित दस्तावेजों की वैधानिकता और प्रक्रिया को लेकर भी प्रश्न उठ रहे हैं।
पूरे मामले में अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या एक अनपढ़ किसान की जमीन उसकी जानकारी के बिना अधिक रकबे में दर्ज कर दी गई, या फिर यह एक वैध लेन-देन था जिसे बाद में विवाद का रूप दिया जा रहा है? इन सवालों के जवाब केवल निष्पक्ष जांच से ही मिल सकते हैं।
कहानी का सबसे अहम अध्याय अब बैंक स्टेटमेंट में छिपा है, क्योंकि पैसा जहां गया होगा, सच भी वहीं मिलेगा।
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