विधानसभा में जल-जंगल-जमीन के साथ गूंजा किसान का दर्द, विधायक लालजीत सिंह राठिया ने कोयला खनन और धान खरीदी व्यवस्था पर उठाए तीखे सवाल
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धरमजयगढ़ लालजीत सिंह राठिया ने विधानसभा में एक साथ जल-जंगल-जमीन, आदिवासी अधिकार और धान खरीदी की अव्यवस्थाओं का मुद्दा उठाकर सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि आदिवासी समाज की आय और अस्तित्व का आधार जल, जंगल और जमीन है। किसान अपनी निजी भूमि देना नहीं चाहते, फिर भी जबरदस्ती जनसुनवाई कराकर कोयला खदानों के लिए जमीन लेने की कोशिश क्यों की जा रही है। राठिया ने सदन को बताया कि जिन क्षेत्रों में पांचवीं अनुसूची लागू है, वहां ग्रामसभा की सहमति अनिवार्य है। बावजूद इसके ग्रामसभा की असहमति के बाद भी जबरन जनसुनवाई कराई जा रही है और जंगलों की कटाई की जा रही है, जो कानून और संविधान दोनों की भावना के खिलाफ है। उन्होंने कहा कि प्रभावित ग्रामीण अपनी बात रखने अधिकारियों के पास जा रहे हैं, लेकिन न तो उनसे मुलाकात हो रही है और न ही उनकी आवाज सुनी जा रही है।

इसी चर्चा के दौरान विधायक राठिया ने धान खरीदी व्यवस्था में हो रही गड़बड़ियों को भी गंभीरता से उठाया। उन्होंने कहा कि कई जगहों पर किसानों से किराए की गाड़ी लेकर धान लोड कराया जाता है, फिर उसे लौटा दिया जाता है, यह कहां का न्याय है। पहाड़ी और दूरस्थ इलाकों में कई किसानों के पास मोबाइल तक नहीं है, ऐसे में ओटीपी और Agri-stack जैसी ऑनलाइन प्रक्रियाएं उनके लिए बड़ी समस्या बन गई हैं। जिनके पास मोबाइल नहीं है, उनका Agri-stack कैसे बनेगा, यह बड़ा सवाल है।
उन्होंने आरोप लगाया कि आरआई और पटवारी स्तर पर किसानों का Agri-stack बनवाकर टोकन कटवाए जा रहे हैं। बड़े किसानों को तो जानकारी और संसाधन मिल जाते हैं, लेकिन छोटे और सीमांत किसान इस व्यवस्था में पिछड़ जाते हैं। विधायक ने कहा कि सरकार के नियमों के अनुसार प्रति एकड़ 21 क्विंटल धान खरीदी तय की गई है, जबकि जमीनी हकीकत यह है कि आज किसान 25 से 30 क्विंटल प्रति एकड़ तक उत्पादन कर रहे हैं।
विधायक राठिया ने याद दिलाया कि पूर्व में कांग्रेस सरकार ने किसानों की मांग और बढ़ती पैदावार को देखते हुए प्रति एकड़ 20 क्विंटल धान खरीदी का निर्णय लिया था, जिसे बाद में 21 क्विंटल किया गया। उन्होंने सवाल उठाया कि जब उत्पादन बढ़ रहा है, तो उसी अनुपात में खरीदी क्यों नहीं बढ़ाई जा रही। इससे किसानों को मजबूरी में धान खुले बाजार में बेचने या नुकसान उठाने को मजबूर होना पड़ रहा है।
उन्होंने यह भी कहा कि छत्तीसगढ़ में बड़ी संख्या में किसान जंगल और पहाड़ी क्षेत्रों में खेती करते हैं, जहां पानी, बिजली और सिंचाई की सुविधाएं सीमित हैं। जंगली जानवरों का खतरा अलग से है, इसके बावजूद किसान मेहनत कर अन्न पैदा कर रहा है। किसान सिर्फ अपने लिए नहीं, बल्कि पूरे समाज के भरण-पोषण के लिए फसल उगाता है, इसलिए उसे हर हाल में सुविधाएं मिलनी चाहिए।
विधायक ने सरकार से मांग की कि जिला कलेक्टर, एसडीएम और संबंधित अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए जाएं कि धान खरीदी किसानों से सही तरीके से हो, किसी के साथ जबरदस्ती या अन्याय न किया जाए। साथ ही जब तक ग्रामसभा और जनता की स्पष्ट सहमति न हो, तब तक कोयला खनन जैसी परियोजनाओं को आगे न बढ़ाया जाए।
विधानसभा में उठे इन मुद्दों के बाद यह साफ है कि जल-जंगल-जमीन के साथ-साथ किसान और धान खरीदी का सवाल भी सरकार के लिए बड़ी चुनौती बनकर सामने आ गया है।
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