October 14, 2026

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छाल रेंज में हाथी शावक की मौत पर सवाल, झुंड ने नहीं अपनाया तो निगरानी की जिम्मेदारी किसकी?

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धरमजयगढ़ – छाल वन परिक्षेत्र में करीब 40 हाथियों के दल से बिछड़ी दो माह की मादा शावक की मौत ने वन विभाग की निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। वन अमले से मिली जानकारी के अनुसार, रात में शावक को हाथियों के झुंड से मिलाने का प्रयास किया गया, इसमें सफलता भी मिली लेकिन झुंड ने उसे स्वीकार नहीं किया। इसके बाद दलदली खेत में उसका शव मिला। आशंका जताई जा रही है कि कीचड़ में फंसने के कारण शावक की मौत हुई, हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।


झुंड ने अपनाया नहीं, तो किसके भरोसे छोड़ दी गई नन्ही जान?

शावक को झुंड से मिलाने का प्रयास अपनी जगह, लेकिन जब हाथियों ने उसे स्वीकार ही नहीं किया, तब उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी वन अमले की थी। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल है कि क्या शावक को सुरक्षित स्थान पर रखकर उसकी लगातार निगरानी की गई? यदि निगरानी हो रही थी, तो वह दलदली खेत तक कैसे पहुंची और समय रहते उसे बचाया क्यों नहीं जा सका? वहीं, यदि निगरानी नहीं थी, तो इसकी वजह क्या रही?

शावक की मौत के घटनाक्रम में एक अहम कड़ी अब भी स्पष्ट होनी बाकी है। वन अमले द्वारा झुंड से अस्वीकार किए जाने की जानकारी के बाद शावक की अंतिम गतिविधियों पर नजर रखी गई थी या नहीं, यह सामने आना चाहिए। साथ ही, शव मिलने के स्थान, मौत के संभावित कारण और मृत शावक की पहचान की आधिकारिक पुष्टि भी जरूरी है।


अब जवाबदेही तय करने की जरूरत

दो माह की शावक अपनी सुरक्षा के लिए पूरी तरह संवेदनशील अवस्था में थी। ऐसे में झुंड द्वारा स्वीकार नहीं किए जाने के बाद उसकी निगरानी और सुरक्षित देखरेख बेहद महत्वपूर्ण थी। अब वन विभाग को स्पष्ट करना चाहिए कि शावक की निगरानी के लिए किसकी जिम्मेदारी तय थी, अंतिम बार उसे कब और कहां देखा गया तथा उसकी मौत किन परिस्थितियों में हुई।
सवाल सिर्फ एक नन्ही हथिनी की मौत का नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का भी है, जिसके भरोसे झुंड से ठुकराई गई शावक की सुरक्षा होनी थी। इन सवालों के जवाब और तथ्यों की पुष्टि से ही स्पष्ट होगा कि यह दुखद घटना किन परिस्थितियों में हुई और कहीं निगरानी में कोई चूक तो नहीं रही।


मृत शावक की पहचान पर सवाल, पहला शावक कहां है?

मामले में एक अहम सवाल यह भी है कि दलदली खेत में मिला मृत शावक क्या वही दो माह की मादा शावक है, जो करीब 40 हाथियों के दल से बिछड़ गई थी? यदि मृत शावक कोई दूसरा है, तो पहले बिछड़े शावक की वर्तमान स्थिति क्या है और वह कहां है? यदि मृत शावक दल से बिछड़ा हुआ शावक नहीं है तो यह दूसरा शावक आया कहाँ से ? वन विभाग को दोनों पहलुओं पर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। मृत शावक की पहचान की आधिकारिक पुष्टि और पहले शावक की तलाश व वर्तमान स्थिति की जानकारी सामने आना जरूरी है।

छाल रेंज में क्यों दलदल में फंस जाते हैँ शावक

इन सब बातों से हटकर जैसे कि आशंका जताई जा रही है कि शावक की मौत कीचड़ में फंसकर हुईं होगी तो यह एक और चौकाने वाला तथ्य है कि छाल रेंज में ही शावकों के दलदल में फंसने के कारण लगातार मौतें क्यों हो रही हैँ जैसा कि विभाग पिछले कुछ मामलों में बताता रहा है , अमूमन ऐसी घटनायें छाल रेंज में ही क्यों घट रही हैं , क्या इसके लिये वहाँ की भौगोलिक परिस्थितियां जिम्मेदार हैं या कुछ और ? अब इस कारण का पर भी शोध करना जरुरी है !

जंगल में भी सुरक्षित नहीं वन्यजीव ?

जंगल कट रहे हैं तो हाथी जाएँगे कहाँ, यह सवाल वास्तव में अत्यंत वाजिब है। जब जंगल के भीतर भी हाथी सुरक्षित नहीं हैं, तो यह स्थिति और भी अधिक चिंताजनक हो जाती है। छाल रेंज में दलदल में फँसकर शावकों की मौत का सिलसिला यहीं थमेगा या ऐसे दर्दनाक मामले आगे भी सामने आते रहेंगे, यह बेहद गंभीर विचारणीय प्रश्न है। फिलहाल शावक की मौत की असली वजह पूरी तरह से साफ़ नहीं हो पाई है, जिससे वन विभाग की मॉनिटरिंग और सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठते हैं।

​जब इंसानी दखल के कारण हाथियों के प्राकृतिक गलियारे और जंगल सिमटते हैं, तो वे असुरक्षित रास्तों की ओर जाने को मजबूर हो जाते हैं। ऐसे संवेदनशील इलाकों में छोटे शावक सबसे पहले दुर्घटनाओं का शिकार बनते हैं। अगर प्रशासन ने समय रहते दलदली और खतरनाक क्षेत्रों की मैपिंग करके सुरक्षा के कड़े इंतज़ाम नहीं किए, तो बेकसूर जीवों की जान जाने का यह सिलसिला यूँ ही जारी रहेगा। ऐसी स्थिति से बचने के लिये ग्राउंड लेवल पर एक मजबूत और मुस्तैद रेस्क्यू टीम का होना सबसे पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। जब तक मैदानी स्तर पर गश्त और रियल-टाइम मॉनिटरिंग नहीं होगी, तब तक ऐसी दुर्घटनाओं को रोकना लगभग नामुमकिन है। इसके साथ ही, जब भी ऐसी लापरवाही या दर्दनाक घटना सामने आए, तो संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों की सीधी जवाबदेही तय की जानी चाहिए ताकि व्यवस्था में गंभीरता आए।

​वन्यजीव केवल जंगलों की शोभा नहीं हैं, वे हमारे पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन बनाए रखने के लिए बेहद जरूरी हैं। जब तक प्रशासन और स्थानीय समाज मिलकर हाथियों के प्राकृतिक आवास और कॉरीडोर की सुरक्षा के लिए ठोस कदम नहीं उठाएंगे, तब तक यह संकट बना रहेगा।

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