विकास की ‘रफ्तार’ में निगल लिया गया अमृत सरोवर!विभागीय जांच में खुलासा: मेड़ से मिट्टी काटकर सड़क निर्माण में उपयोग, देखते ही देखते मिट गया सरकारी जलस्रोत !
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धरमजयगढ़ – विकास कार्यों की तेज रफ्तार के बीच जल संरक्षण से जुड़ी सरकारी योजना की जमीन पर हकीकत सामने आने के बाद कई गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। धरमजयगढ़ विकासखंड के ग्राम पंचायत सिसरिंगा में योजना के तहत निर्मित ‘अमृत सरोवर’ के अस्तित्व पर ही सवाल खड़ा हो गया है। मामले में जनपद पंचायत धरमजयगढ़ के मुख्य कार्यपालन अधिकारी द्वारा की गई विभागीय जांच के बाद जिला पंचायत सीईओ को प्रतिवेदन भेजे जाने की जानकारी सामने आई है।
जांच प्रतिवेदन में उल्लेख किया गया है कि अमृत सरोवर की मेड़ से मिट्टी काटकर सड़क निर्माण कार्य में उपयोग किए जाने के कारण सरोवर का स्वरूप प्रभावित हुआ और वह लुप्त हो गया। प्रतिवेदन में सड़क निर्माण कार्य से जुड़े इस घटनाक्रम का उल्लेख किया गया है, जिससे यह मामला महज ग्रामीणों की शिकायत तक सीमित नहीं रह जाता, बल्कि विभागीय जांच के दस्तावेज तक पहुंच चुका है।
लाखों की लागत से बने जलस्रोत हुआ विलुप्त ?
अमृत सरोवर योजना का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में जल संरक्षण, वर्षाजल संचयन और स्थानीय स्तर पर जल उपलब्धता को मजबूत करना है। ऐसे में किसी निर्मित सरोवर का मिट्टी कटाव अथवा अन्य निर्माण गतिविधियों के कारण अस्तित्व प्रभावित होना योजना के मूल उद्देश्य पर ही गंभीर सवाल खड़े करता है।

सिसरिंगा में सामने आए मामले में जांच प्रतिवेदन के अनुसार सड़क निर्माण के लिए सरोवर की मेड़ से मिट्टी का उपयोग किए जाने की बात सामने आई है। इससे सरोवर की संरचना प्रभावित होने के साथ उसका मूल स्वरूप भी समाप्त होने की स्थिति बताई गई है।
जांच रिपोर्ट ने खोली तस्वीर, अब कार्रवाई पर नजर
मामले की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी विभागीय जांच प्रतिवेदन है। जनपद पंचायत धरमजयगढ़ के सीईओ द्वारा जांच के बाद जिला पंचायत सीईओ को प्रतिवेदन भेजा गया है। यानी मामले में विभागीय स्तर पर जांच की प्रक्रिया पूरी होकर रिपोर्ट उच्च स्तर तक पहुंच चुकी है।
हालांकि, अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि जांच प्रतिवेदन के बाद जिम्मेदारी तय करने और क्षतिग्रस्त अथवा लुप्त हुए जलस्रोत की स्थिति बहाल करने के लिए क्या कार्रवाई की गई? यदि किसी निर्माण एजेंसी अथवा संबंधित पक्ष की गतिविधि से सरकारी परिसंपत्ति को नुकसान पहुंचने की पुष्टि होती है, तो उसकी भरपाई और पुनर्स्थापना की जिम्मेदारी तय होना स्वाभाविक रूप से महत्वपूर्ण माना जाएगा।

सड़क निर्माण और जल संरक्षण आमने-सामने
सिसरिंगा का मामला विकास कार्यों और पर्यावरणीय एवं जल संरक्षण संबंधी परिसंपत्तियों के बीच संतुलन का भी गंभीर मुद्दा सामने लाता है। सड़क निर्माण जैसी महत्वपूर्ण आधारभूत संरचना परियोजनाओं के दौरान यदि पहले से निर्मित जलस्रोत अथवा उसकी संरचना प्रभावित होती है, तो संबंधित विभागों के बीच समन्वय और निगरानी की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
पुनर्स्थापना और जवाबदेही की उम्मीद
सिसरिंगा के ग्रामीणों के लिए मुद्दा केवल एक तालाब के अस्तित्व का नहीं, बल्कि उस जलस्रोत से जुड़े सार्वजनिक हित का है। यदि सरकारी योजना के तहत निर्मित अमृत सरोवर वास्तव में निर्माण गतिविधियों के कारण अस्तित्वहीन हुआ है, तो संबंधित विभागों के सामने दो प्रमुख जिम्मेदारियां होंगी—जिम्मेदारी तय करना और जलस्रोत को यथासंभव मूल स्वरूप में पुनर्स्थापित करना।
विभागीय जांच प्रतिवेदन सामने आने के बाद अब निगाहें जिला प्रशासन और संबंधित विभाग पर टिकी हैं कि इस मामले में आगे क्या निर्णय लिया जाता है !
इस बहूचर्चित मामले में जाँच प्रतिवेवदन को लेकर भी सवाल खड़े हो रहे हैं जिसका विस्तृत विवरण आगामी दिनों में जल्द ही सामने आयेगा !
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