लाखों की जमीन खरीदी, मगर नामांतरण अटका: शासकीय पट्टे की भूमि की रजिस्ट्री पर एसडीएम कोर्ट का बड़ा फैसला
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कलेक्टर की पूर्व लिखित अनुमति के बिना हस्तांतरण को नहीं मिली मान्यता, तहसीलदार का आदेश बरकरार; खरीदार की अपील खारिज

धरमजयगढ़ – शासकीय पट्टे पर मिली जमीन खरीदने के बाद भी यदि सक्षम प्राधिकारी की पूर्व अनुमति नहीं ली गई है, तो केवल पंजीकृत विक्रय पत्र के आधार पर राजस्व अभिलेखों में नामांतरण का दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता। अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) धरमजयगढ़ भरत कौशिक के न्यायालय ने 3 सितंबर 2026 को दिए एक महत्वपूर्ण फैसले में तहसीलदार छाल के आदेश को यथावत रखते हुए खरीदार की अपील खारिज कर दी।
मामला तहसील छाल के ग्राम हाटी स्थित खसरा नंबर 1347/2, रकबा 1.861 हेक्टेयर से जुड़ा है। कुड़ेकेला निवासी पुष्पेन्द्र कुमार गोयल पिता बुधराम ने इस भूमि को मोहम्मद अय्यूब, मोहम्मद आशिक और सैनाब खातून से 12 लाख 55 हजार रुपये में पंजीकृत विक्रय पत्र के माध्यम से खरीदा था। विक्रय पत्र 16 फरवरी 2024 को पंजीकृत हुआ।
रजिस्ट्री के बाद खरीदार ने जमीन अपने नाम दर्ज कराने के लिए नामांतरण आवेदन प्रस्तुत किया, लेकिन राजस्व अभिलेखों की जांच में मामला यहीं अटक गया। पटवारी प्रतिवेदन और उपलब्ध अभिलेखों से सामने आया कि संबंधित भूमि मूल रूप से वर्ष 1978-79 में शासकीय पट्टे के रूप में आबंटित की गई थी।
रजिस्ट्री हो गई, लेकिन नामांतरण नहीं
तहसीलदार छाल के समक्ष हुई कार्यवाही में यह तथ्य सामने आया कि शासकीय पट्टे की भूमि के हस्तांतरण के लिए आवश्यक सक्षम प्राधिकारी की पूर्व लिखित अनुमति अभिलेख पर उपलब्ध नहीं थी। इसी आधार पर तहसीलदार छाल ने 30 सितंबर 2024 को नामांतरण आवेदन निरस्त कर दिया।
इसके बाद खरीदार ने तहसीलदार के आदेश को एसडीएम न्यायालय में चुनौती दी। अपील में यह तर्क रखा गया कि नामांतरण राजस्व अभिलेखों में दर्ज करने की प्रक्रिया है और राजस्व न्यायालय को पंजीकृत विक्रय पत्र की वैधता पर निर्णय करने का अधिकार नहीं है। यह भी दलील दी गई कि जब तक सक्षम सिविल न्यायालय पंजीकृत दस्तावेज को शून्य घोषित नहीं करता, तब तक उसके आधार पर नामांतरण रोका नहीं जाना चाहिए।
एसडीएम कोर्ट ने अभिलेखों को माना निर्णायक
एसडीएम भरत कौशिक ने मामले की सुनवाई के दौरान वर्ष 1978-79 के पट्टा आवंटन आदेश और संशोधन पंजी सहित उपलब्ध राजस्व अभिलेखों का परीक्षण किया। अभिलेखों के आधार पर न्यायालय ने पाया कि विवादित भूमि शासकीय पट्टे से संबंधित है और उसके हस्तांतरण के लिए आवश्यक पूर्व अनुमति का अभाव है।
न्यायालय ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि कानून में निर्धारित प्रतिबंधों का पालन किए बिना और सक्षम प्राधिकारी की आवश्यक अनुमति के अभाव में किया गया हस्तांतरण राजस्व अभिलेखों में नामांतरण का आधार नहीं बन सकता। न्यायालय ने तहसीलदार छाल के आदेश को विधिसम्मत मानते हुए उसे बरकरार रखा और पुष्पेन्द्र कुमार गोयल की अपील खारिज कर दी।
लाखों की रजिस्ट्री के बाद भी नहीं मिला नामांतरण
इस फैसले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि जमीन की रजिस्ट्री हो जाने मात्र से खरीदार का नाम राजस्व अभिलेखों में दर्ज होना स्वतः सुनिश्चित नहीं होता, खासकर तब जब संबंधित भूमि पर कानूनन हस्तांतरण संबंधी प्रतिबंध लागू हों।
मामले में खरीदार द्वारा 12.55 लाख रुपये का भुगतान कर पंजीकृत विक्रय पत्र हासिल किया गया, लेकिन आवश्यक अनुमति के अभाव में नामांतरण की कार्यवाही आगे नहीं बढ़ सकी। फैसला ऐसे मामलों में जमीन खरीदने से पहले भूमि के मूल स्वरूप, पट्टा शर्तों और हस्तांतरण की अनुमति की जांच को लेकर महत्वपूर्ण संकेत देता है।
यानी रजिस्ट्री के कागज हाथ में होना अलग बात है और उस जमीन पर वैध रूप से नामांतरण एवं अधिकार हासिल होना अलग।
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