अस्पताल में मौत के बाद भी नहीं जागी व्यवस्था, घंटों वार्ड में पड़ी रही अज्ञात महिला की लाश !
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धरमजयगढ़ – अस्पताल… वह जगह जहां इंसान जिंदगी बचाने की उम्मीद लेकर पहुंचता है। जहां हर पल इलाज, संवेदना और जिम्मेदारी की उम्मीद होती है। लेकिन धरमजयगढ़ के सिविल अस्पताल से सामने आई एक तस्वीर इन उम्मीदों को झकझोर देने वाली है। एक अज्ञात महिला की उपचार के दौरान मौत हो गई और कथित तौर पर उसका शव घंटों तक उसी चिकित्सा वार्ड में पड़ा रहा। कुछ ही दूरी पर दूसरे मरीज और उनके परिजन बैठकर खाना खाते रहे। इस पूरे घटनाक्रम का वीडियो सामने आने के बाद लोगों के बीच सवाल और आक्रोश दोनों गहराने लगे हैं।

एक तरफ मौत… दूसरी तरफ चलता रहा रोजमर्रा का सिलसिला
सोशल मीडिया पर सामने आए वीडियो में अस्पताल के वार्ड का ऐसा दृश्य दिखाई देता है जिसे देखकर कोई भी विचलित हो सकता है। एक बिस्तर पर महिला का शव पड़ा है और आसपास इलाज करा रहे मरीज अपनी मजबूरी में बैठे हुए हैं। इसी बीच कुछ मरीज और उनके परिजन भोजन करते नजर आते हैं।

यह दृश्य इसलिए और भी कचोटता है क्योंकि अस्पताल के भीतर मौजूद हर व्यक्ति किसी न किसी तकलीफ से जूझ रहा होता है। ऐसे माहौल में यदि किसी मृत व्यक्ति का शव घंटों तक उसी वार्ड में पड़ा रहे तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर व्यवस्था किस स्तर पर चूक गई।

मौत के बाद भी व्यवस्था क्यों जागी नहीं?
जानकारी के अनुसार शनिवार को एक अज्ञात महिला की उपचार के दौरान मौत हुई। इसके बाद शव को वार्ड से हटाने में देरी होने की बात सामने आई है।
सवाल सीधा है , जब महिला की मौत हो गई थी तो शव को तत्काल वार्ड से हटाने की व्यवस्था क्यों नहीं हुई?
क्या ड्यूटी पर मौजूद स्टाफ को इसकी जानकारी नहीं थी?
अगर जानकारी थी तो कार्रवाई में देरी क्यों हुई?
और अगर जानकारी नहीं थी तो वार्ड की निगरानी व्यवस्था आखिर कितनी प्रभावी है?
इन सवालों का जवाब अब अस्पताल प्रबंधन को देना होगा।

वीडियो सामने आया तो मचा हड़कंप
घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आने के बाद मामला तेजी से चर्चा में आ गया। वीडियो ने अस्पताल की व्यवस्था को लेकर लोगों की चिंता और नाराजगी बढ़ा दी।
जिस अस्पताल में लोग अपने परिजनों को इलाज के लिए लेकर आते हैं, वहां इस तरह की तस्वीर सामने आना केवल प्रशासनिक चूक नहीं बल्कि व्यवस्था की गंभीर कमजोरी का संकेत माना जा रहा है।
भाजपा नेताओं ने अस्पताल पहुंचकर जताई नाराजगी
घटना की जानकारी मिलने के बाद भाजपा मंडल महामंत्री एवं पूर्व सैनिक भोगेश्वर बेहरा, नवनियुक्त एल्डरमैन नीरज अग्रवाल, भाजयुमो अध्यक्ष धरमजयगढ़ समय अग्रवाल और पार्षद जानू सिदार अस्पताल पहुंचे।

नेताओं ने मामले को गंभीर बताते हुए ब्लॉक मेडिकल ऑफिसर को अस्पताल पहुंचने के लिए कहा। बीएमओ के पहुंचने में देरी को लेकर भी नाराजगी जताई गई।
इसी दौरान अस्पताल की अव्यवस्थाओं और शव के पास मरीजों के भोजन करने वाले वायरल वीडियो को लेकर पूर्व सैनिक भोगेश्वर बेहरा और बीएमओ के बीच तीखी बहस होने की जानकारी सामने आई है।

बीएमओ बोले—’कम्युनिकेशन गैप’ था
मामले पर बीएमओ ने कहा कि उन्हें महिला की मौत की सूचना समय पर नहीं मिल पाई थी। उनके अनुसार अस्पताल स्टाफ के बीच सूचना के आदान-प्रदान में कमी के कारण देरी हुई और सूचना मिलने के बाद आवश्यक कार्रवाई की गई।
लेकिन सवाल यह है कि क्या किसी मरीज की मौत की सूचना समय पर जिम्मेदार अधिकारी तक नहीं पहुंचना महज ‘कम्युनिकेशन गैप’ है?
अस्पताल में किसी मरीज की मौत एक गंभीर स्थिति होती है। ऐसे समय में सूचना, शव को हटाने की प्रक्रिया और आगे की कार्रवाई में देरी की कोई गुंजाइश नहीं होनी चाहिए।
सवाल सिर्फ शव का नहीं, पूरी व्यवस्था का है
इस घटना ने एक साथ कई सवाल खड़े कर दिए हैं। अगर अस्पताल के वार्ड में घंटों तक शव पड़ा रहा तो ड्यूटी पर मौजूद कर्मचारियों की जिम्मेदारी क्या थी? सूचना व्यवस्था कहां विफल हुई? क्या इस मामले की कोई आंतरिक जांच होगी? क्या ड्यूटी पर मौजूद कर्मचारियों से जवाब लिया जाएगा?
और सबसे बड़ा सवाल—क्या इस घटना के बाद व्यवस्था में कोई ठोस सुधार होगा या फिर कुछ दिनों बाद यह मामला भी दूसरी घटनाओं की तरह भुला दिया जाएगा?
जनता को सफाई नहीं, जवाब चाहिए
धरमजयगढ़ की जनता सरकारी अस्पताल को केवल एक इमारत के रूप में नहीं देखती। यह क्षेत्र के गरीब और जरूरतमंद लोगों के लिए इलाज का सबसे बड़ा सहारा है। इसलिए अस्पताल से जुड़ी ऐसी तस्वीरें लोगों के भरोसे को सीधे प्रभावित करती हैं।
यह मामला किसी राजनीतिक दल या व्यक्ति के पक्ष-विपक्ष का मुद्दा नहीं होना चाहिए। यह अस्पताल की व्यवस्था, जवाबदेही और मरीजों से जुड़े बुनियादी मानवीय सरोकारों का मामला है।

एक महिला की मौत के बाद उसका शव घंटों तक वार्ड में पड़ा रहा—यह तस्वीर अपने आप में इतनी भयावह है कि किसी सफाई की जरूरत ही नहीं पड़नी चाहिए।

अस्पताल में इलाज कराने वाला हर मरीज इस भरोसे के साथ आता है कि उसकी तकलीफ को समझा जाएगा। अगर उसी अस्पताल में मौत के बाद व्यवस्था इतनी देर से जागे, तो सवाल सिर्फ एक घटना पर नहीं, पूरे सिस्टम की संवेदनशीलता पर उठेंगे।
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