July 7, 2026

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क्या धरमजयगढ़ बनने जा रहा है छत्तीसगढ़ का अगला ‘कोल हब’? बढ़ते कोल ब्लॉकों ने बढ़ाई हलचल !

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धरमजयगढ़ – रायगढ़ जिले का धरमजयगढ़ क्षेत्र आने वाले वर्षों में छत्तीसगढ़ के सबसे बड़े कोयला क्षेत्रों में शामिल हो सकता है। मांड-रायगढ़ कोलफील्ड में स्थित कई कोल ब्लॉक पहले से संचालित हैं, जबकि कई अन्य ब्लॉक आवंटन, अन्वेषण, पर्यावरणीय स्वीकृति, वन स्वीकृति और भूमि अधिग्रहण जैसी प्रक्रियाओं से गुजर रहे हैं। यदि इन परियोजनाओं को आवश्यक वैधानिक मंजूरियाँ मिलती हैं और वे उत्पादन तक पहुँचती हैं, तो धरमजयगढ़ की पहचान एक बड़े कोल हब के रूप में उभर सकती है।
धरमजयगढ़ क्षेत्र में पुरूंगा, शेरबंद, साम्हरसिंघा, तराईमार, दुर्गापुर-II (सरिया) और दुर्गापुर-II (तराईमार) जैसे कोल ब्लॉक लगातार चर्चा में हैं। इनमें से कुछ परियोजनाओं पर पर्यावरणीय मूल्यांकन, कुछ पर जनसुनवाई, तो कुछ पर भूमि अधिग्रहण और वन भूमि हस्तांतरण की प्रक्रिया चल चुकी है या प्रस्तावित रही है। सार्वजनिक दस्तावेज़ बताते हैं कि मांड-रायगढ़ कोलफील्ड देश के महत्वपूर्ण गैर-कोकिंग कोयला क्षेत्रों में से एक है, जहाँ विशाल कोयला भंडार उपलब्ध हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि प्रस्तावित परियोजनाएँ आगे बढ़ती हैं, तो क्षेत्र में नई सड़कें, रेलवे नेटवर्क, कोयला परिवहन, औद्योगिक गतिविधियाँ और रोजगार के अवसर बढ़ सकते हैं। दूसरी ओर, वन क्षेत्र, जैव विविधता, हाथी कॉरिडोर, जल स्रोतों और स्थानीय समुदायों पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों को लेकर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं। कई परियोजनाओं के संबंध में स्थानीय स्तर पर आपत्तियाँ और पर्यावरणीय चिंताएँ भी सामने आती रही हैं।
धरमजयगढ़ के सामने अब सबसे बड़ा प्रश्न केवल विकास का नहीं, बल्कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन का है। क्या यह क्षेत्र ऊर्जा उत्पादन का नया केंद्र बनेगा, या फिर खनन विस्तार के साथ पर्यावरणीय और सामाजिक चुनौतियाँ भी उतनी ही तेजी से बढ़ेंगी? आने वाले वर्षों में इस प्रश्न का उत्तर सरकारी निर्णयों, वैधानिक स्वीकृतियों और स्थानीय समुदायों की भागीदारी से तय होगा।
खनन विशेषज्ञों का मानना है कि धरमजयगढ़ में प्रस्तावित और विकासाधीन कोल परियोजनाओं की संख्या को देखते हुए यह क्षेत्र आने वाले समय में छत्तीसगढ़ की खनन अर्थव्यवस्था का प्रमुख केंद्र बन सकता है। ऐसे में इस पूरे क्षेत्र की प्रत्येक परियोजना, उसकी स्वीकृतियों और उसके सामाजिक-पर्यावरणीय प्रभावों पर पारदर्शी निगरानी पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।

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