May 10, 2026

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RSS के कर्मयोगी: नानाजी देशमुख और चित्रकूट से ग्रामोदय की ऐतिहासिक यात्राग्राम स्वावलंबन, शिक्षा और राष्ट्र निर्माण का अद्वितीय मॉडल

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चित्रकूट- भारत के ग्रामीण क्षेत्रों को लेकर लंबे समय तक यह धारणा बनी रही कि गांव केवल गरीबी, अशिक्षा और पिछड़ेपन के प्रतीक हैं। लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक एवं प्रखर राष्ट्रचिंतक नानाजी देशमुख ने इस सोच को बदलने का कार्य किया। उन्होंने गांवों में केवल समस्याएं नहीं देखीं, बल्कि वहां भारत की आत्मा और राष्ट्र निर्माण की अपार संभावनाएं देखीं।
भारतीय जनसंघ के प्रमुख रणनीतिकारों में शामिल रहे नानाजी देशमुख ने सक्रिय राजनीति के शिखर पर पहुंचने के अवसरों को त्यागकर समाज सेवा और ग्रामोदय का मार्ग चुना। आपातकाल के दौरान लोकतंत्र की रक्षा के संघर्ष में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के बाद उन्होंने 60 वर्ष की आयु में राजनीति से संन्यास लेकर स्वयं को पूर्णतः ग्रामीण पुनर्निर्माण के कार्य में समर्पित कर दिया।

चित्रकूट को बनाया कर्मभूमि

नानाजी देशमुख ने अपने प्रयोगों के लिए चुना चित्रकूट का वह क्षेत्र, जो वर्षों से गरीबी, जल संकट, अशिक्षा और पलायन जैसी समस्याओं से जूझ रहा था। उन्होंने यहां केवल योजनाओं की घोषणा नहीं की, बल्कि गांवों में रहकर लोगों के साथ मिलकर कार्य किया।
उनका स्पष्ट विश्वास था कि यदि गांव आत्मनिर्भर बनेंगे, तो भारत स्वतः मजबूत और समृद्ध बन जाएगा। इसी विचार के साथ उन्होंने ग्राम स्वावलंबन का ऐसा मॉडल विकसित किया, जिसकी चर्चा पूरे देश में होने लगी।

दीनदयाल शोध संस्थान बना परिवर्तन का केंद्र

ग्रामीण विकास के इस अभियान को संगठित स्वरूप देने के लिए दीनदयाल शोध संस्थान को मजबूत आधार प्रदान किया गया। संस्थान के माध्यम से कृषि, स्वास्थ्य, शिक्षा, महिला सशक्तिकरण, कौशल विकास और जल संरक्षण जैसे क्षेत्रों में व्यापक कार्य प्रारंभ हुए।

नानाजी देशमुख का मॉडल सरकारी अनुदान आधारित नहीं था।

वे जनभागीदारी और आत्मनिर्भरता में विश्वास रखते थे। गांव के लोग स्वयं अपने विकास के भागीदार बनें—यही उनके कार्य का मूल आधार था।

जल संरक्षण से बदली तस्वीर

चित्रकूट क्षेत्र लंबे समय तक जल संकट से प्रभावित रहा। नानाजी देशमुख के मार्गदर्शन में स्वयंसेवकों और ग्रामीणों ने मिलकर तालाब, छोटी बांध संरचनाएं, जलसंचयन एवं संरक्षण के अनेक कार्य किए। परिणामस्वरूप सूखे और बंजर क्षेत्र धीरे-धीरे हरियाली में बदलने लगे तथा कृषि उत्पादन में भी वृद्धि हुई।
उन्होंने किसानों को जैविक खेती, उन्नत कृषि तकनीक और स्थानीय संसाधनों के उपयोग के लिए प्रेरित किया। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा मिली।

शिक्षा, संस्कार और स्वावलंबन का समन्वय

नानाजी देशमुख का मानना था कि विकास केवल भवनों और सड़कों के निर्माण से नहीं होता, बल्कि समाज में आत्मविश्वास, शिक्षा और संस्कार जागृत होने से होता है। इसी सोच के साथ बच्चों के लिए विद्यालय, युवाओं के लिए कौशल प्रशिक्षण तथा महिलाओं के लिए आत्मनिर्भरता कार्यक्रम संचालित किए गए।
उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा को रोजगार और सामाजिक चेतना से जोड़ने का प्रयास किया।

महात्मा गांधी चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय की स्थापना

ग्रामीण विकास की इसी व्यापक अवधारणा को संस्थागत स्वरूप देने हेतु महात्मा गांधी चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय की स्थापना हुई, जिसे भारत का प्रथम ग्रामीण विश्वविद्यालय माना जाता है। इस विश्वविद्यालय की स्थापना का उद्देश्य था—गांवों की आवश्यकताओं के अनुरूप शिक्षा, अनुसंधान और प्रशिक्षण की व्यवस्था विकसित करना।
विश्वविद्यालय में कृषि, ग्रामीण विकास, सामाजिक कार्य, ग्राम प्रबंधन, जैविक खेती, पंचायती राज, पर्यावरण और स्वावलंबन आधारित शिक्षा पर विशेष बल दिया गया। यहां शिक्षा को केवल डिग्री प्राप्ति का माध्यम नहीं, बल्कि ग्रामोदय और राष्ट्रोदय का साधन माना गया।
विश्वविद्यालय के संचालन में भी नानाजी देशमुख की ग्रामकेंद्रित सोच स्पष्ट दिखाई देती है। यहां विद्यार्थियों को ग्रामीण जीवन, सेवा और व्यवहारिक प्रशिक्षण से जोड़ने का प्रयास किया जाता रहा है। ग्रामोदय विश्वविद्यालय आज भी ग्रामीण पुनर्निर्माण की अवधारणा का महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है।
राष्ट्र ने किया सम्मान
चित्रकूट मॉडल की चर्चा देश और विदेश तक पहुंची। अनेक राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने यहां के विकास मॉडल का अध्ययन किया। राष्ट्र निर्माण और ग्रामीण उत्थान में उनके अतुलनीय योगदान के लिए भारत सरकार ने नानाजी देशमुख को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान “भारत रत्न” से अलंकृत किया।
किन्तु उनके लिए सबसे बड़ा सम्मान ग्रामीण समाज का विश्वास और आत्मीयता थी।

राष्ट्र निर्माण का जीवंत उदाहरण

नानाजी देशमुख ने उपेक्षित ग्रामीण क्षेत्रों को आत्मनिर्भर भारत के आदर्श मॉडल के रूप में विकसित करने का प्रयास किया।
नानाजी देशमुख का जीवन यह संदेश देता है कि राष्ट्र निर्माण केवल संसदों और महानगरों में नहीं होता, बल्कि गांवों की मिट्टी, श्रम और समाज की सहभागिता से भी होता है। जब कोई स्वयंसेवक सत्ता नहीं, बल्कि समाज को चुनता है, तब इतिहास केवल लिखा नहीं जाता—वह जिया जाता है।

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