पहले अनुमति के अभाव में नामांतरण निरस्त, बाद में उसी भूमि का नामांतरण दर्ज
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धरमजयगढ़ – रायगढ़ जिले की छाल तहसील अंतर्गत ग्राम सिंगीझाप में स्थित एक भूमि के नामांतरण को लेकर सामने आए दो अलग-अलग आदेश चर्चा का विषय बने हुए हैं। खसरा नंबर 90/2/ज, रकबा 1.2140 हेक्टेयर की इस भूमि के संबंध में उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार, पूर्व में नामांतरण आवेदन खारिज किया गया था, जबकि बाद की कार्यवाही में इसी भूमि का नामांतरण क्रेता के पक्ष में दर्ज किया गया। दोनों आदेशों के बीच अंतर को लेकर अब संबंधित दस्तावेजों और राजस्व प्रक्रिया के परीक्षण की मांग उठ रही है।

पहले नामांतरण आवेदन पर क्या हुआ था?
उपलब्ध पूर्व आदेश के अनुसार, संबंधित भूमि को शासकीय आबंटन से प्राप्त भूमि बताया गया था। आदेश में भूमि के हस्तांतरण के लिए सक्षम प्राधिकारी की अनुमति की आवश्यकता का उल्लेख किया गया था। अनुमति उपलब्ध नहीं होने के आधार पर उस समय प्रस्तुत नामांतरण आवेदन को स्वीकार नहीं किया गया था।
इसके बाद इसी भूमि से संबंधित एक अन्य नामांतरण प्रकरण में अलग आदेश पारित होने की जानकारी सामने आई है। बाद की कार्यवाही के पश्चात राजस्व अभिलेखों में भूमि हर्ष पटेल, पिता टीका राम के नाम दर्ज होने की बात सामने आई है।
पूर्व आदेश के बाद दूसरी कार्यवाही कैसे हुई?
मामले में मुख्य प्रश्न यह है कि पहले नामांतरण आवेदन के खारिज होने के बाद बाद में उसी भूमि के संबंध में नया नामांतरण प्रकरण किन दस्तावेजों और आधारों पर स्वीकार किया गया। साथ ही यह भी देखना महत्वपूर्ण है कि बाद की कार्यवाही के दौरान पूर्व में पारित आदेश और भूमि की प्रकृति का परीक्षण किस स्तर पर किया गया।
बताया जा रहा है कि बाद के आदेश में पूर्व नामांतरण प्रकरण के खारिज होने का स्पष्ट उल्लेख नहीं है। हालांकि, इसकी वास्तविक स्थिति संबंधित दोनों प्रकरणों की मूल नस्ती और राजस्व अभिलेखों के परीक्षण से ही स्पष्ट हो सकेगी।
पूर्व आदेश में भूमि को शासकीय आबंटन से प्राप्त बताया गया है। ऐसे में भूमि के मूल आबंटन की शर्तें, उसके हस्तांतरण से संबंधित प्रावधान और सक्षम प्राधिकारी की अनुमति की स्थिति इस पूरे मामले में महत्वपूर्ण हो जाती है।
जांच के दौरान यह स्पष्ट किया जाना आवश्यक होगा कि बाद के नामांतरण प्रकरण में कौन-कौन से दस्तावेज प्रस्तुत किए गए थे, भूमि की प्रकृति किस आधार पर निर्धारित की गई और नामांतरण स्वीकृत करते समय पूर्व आदेश का संज्ञान लिया गया था या नहीं।
निष्पक्ष परीक्षण से ही स्पष्ट होगी स्थिति
मामले में किसी पक्ष पर सीधे आरोप लगाने के बजाय दोनों नामांतरण प्रकरणों की मूल नस्ती, आदेश पत्र, भूमि अभिलेख, पंजीकृत दस्तावेज और संबंधित अनुमति पत्रों का परीक्षण कराया जाना अधिक उचित होगा। यदि दस्तावेजों के परीक्षण में दोनों प्रकरणों के तथ्यों में समानता पाई जाती है और निर्णय अलग-अलग होने के कारण स्पष्ट नहीं होते हैं, तो संबंधित राजस्व अधिकारियों से प्रक्रिया और निर्णय के आधार की जानकारी ली जा सकती है।
फिलहाल उपलब्ध दस्तावेजों से इतना सामने आता है कि एक ही खसरा नंबर और रकबे की भूमि के संबंध में अलग-अलग समय पर अलग परिणाम सामने आए हैं। अब यह प्रशासनिक स्तर पर जांच का विषय है कि बाद का नामांतरण किन आधारों पर स्वीकृत हुआ और पूर्व आदेश की स्थिति का उस दौरान किस प्रकार परीक्षण किया गया।
मामले की निष्पक्ष जांच और मूल अभिलेखों के परीक्षण के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि दोनों आदेशों के बीच अंतर का वास्तविक कारण क्या था और पूरी प्रक्रिया संबंधित राजस्व नियमों के अनुरूप संपादित की गई थी या नहीं।
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