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18 साल पुराने बहुचर्चित पोराबाई नकल प्रकरण में बड़ा फैसला – मुख्य आरोपी सहित चार दोषियों को 5-5 साल की कठोर कारावास की सजा

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संवाददाता : जिला ब्यूरो चीफ जांजगीर-चांपा। उदघोष समय न्यूज़, 30 जनवरी 2026।

जांजगीर-चांपा : जांजगीर-चांपा जिले में 2008 की छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल (CGBSE) 12वीं बोर्ड परीक्षा से जुड़े फर्जी टॉपर प्रकरण में आखिरकार न्याय हुआ है। द्वितीय अपर सत्र न्यायाधीश श्री गणेश राम पटेल की अदालत ने राज्य सरकार की अपील पर सुनवाई पूरी करते हुए निचली अदालत के 2020 के बरी फैसले को पलट दिया है।


मुख्य आरोपी छात्रा पोराबाई (शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, बिर्रा) सहित कुल चार आरोपियों को दोषी करार देते हुए प्रत्येक को 5-5 वर्ष का कठोर कारावास (rigorous imprisonment) और 5-5 हजार रुपये का अर्थदंड सुनाया गया है। जुर्माना न चुकाने पर अतिरिक्त 3-3 महीने की सजा का प्रावधान भी है। सभी सजाएं एक साथ चलेंगी। फैसला 29 जनवरी 2026 को सुनाया गया, और दोषियों को तुरंत जेल भेज दिया गया।


दोषी ठहराए गए आरोपी:
पोराबाई (मुख्य आरोपी, छात्रा)
फूलसाय नृसिंह (परीक्षा केंद्राध्यक्ष)
एस.एल. जाटव (स्कूल प्राचार्य)
दीपक जाटव (सहयोगी)
मामले में कुल 9 आरोपी थे, लेकिन बाकी 5 को साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया गया।


पूरा मामला क्या था?
साल 2008 में छत्तीसगढ़ बोर्ड की 12वीं परीक्षा में पोराबाई को 500 में से 484 अंकों के साथ प्रदेश टॉपर घोषित किया गया था। परिणाम आने के बाद बोर्ड को संदेह हुआ। जांच में खुलासा हुआ कि उत्तर पुस्तिकाओं में हैंडराइटिंग अलग-अलग थी – छात्रा ने खुद पेपर नहीं लिखा था, बल्कि किसी और से फर्जी तरीके से लिखवाया गया था।


यह सुनियोजित साजिश थी, जिसमें परीक्षा केंद्र, स्कूल प्रबंधन और अन्य शामिल थे। जांच के आधार पर बम्हनीडीह थाने में FIR दर्ज हुई। आरोपियों पर भारतीय दंड संहिता की धारा 420 (धोखाधड़ी), 467 (जालसाजी), 468 (जालसाजी के लिए दस्तावेज तैयार करना), 471 (जाली दस्तावेज इस्तेमाल), 120B (आपराधिक साजिश) और छत्तीसगढ़ मान्यता प्राप्त परीक्षा अधिनियम की संबंधित धाराएं लगाई गईं।


कानूनी सफर:
2020 में न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी, चांपा ने अभियोजन पक्ष के साक्ष्य अभाव में सभी 9 आरोपियों को बरी कर दिया था।


राज्य शासन ने इस फैसले के खिलाफ अपील दायर की।


अपील पर द्वितीय अपर सत्र न्यायालय में विस्तृत सुनवाई हुई। न्यायाधीश ने साक्ष्यों का पुनर्मूल्यांकन कर चार आरोपियों को दोषी पाया और सख्त सजा सुनाई।


लोक अभियोजक संदीप सिंह बनाफर ने कहा, “यह फैसला शिक्षा व्यवस्था में निष्पक्षता, पारदर्शिता और मेहनत करने वाले लाखों छात्रों के साथ न्याय की बड़ी जीत है। नकल और फर्जीवाड़े के खिलाफ सख्त संदेश गया है।”


यह मामला छत्तीसगढ़ में नकल के खिलाफ एक मिसाल बन गया है। शिक्षा जगत में इस फैसले से हड़कंप मचा हुआ है, और कई लोग इसे परीक्षा प्रक्रिया को मजबूत बनाने का अवसर मान रहे हैं।

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