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पर्यावरण एवं पर्यटन अंक-  43 

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      सह-अस्तित्व जीवन का संकल्प है —

                   “गुरु घासीदास – तैमोर पिंगला बाघ अभयारण्य”

                                        बीरेन्द्र श्रीवास्तव की कलम से 

              खुद तेरी जिंदगी है केवल चार दिनों की 

                पर जिद है तुझे पूरी कायनात चाहिए 

       संभाग ब्यूरो दुर्गा गुप्ता

हमारी पृथ्वी इस विशाल ब्रह्मांड का एक ऐसा हिस्सा है जहां पर  जीवन  है अन्यथा इसके चारों ओर निर्वाण शून्य अंतरिक्ष फैला हुआ है।  यदि हम अपनी पृथ्वी की स्थिति को इस विशाल ब्रह्मांड की तुलना में देखते हैं तब हमारी पृथ्वी एक रेत के कण से भी छोटी दिखाई  पड़ती है,  लेकिन इस पृथ्वी पर रहने वाला मानव अपने भौतिक विकास और  प्रतिस्पर्धा के दौड़  में एक दूसरे को नीचा दिखाने की होड़ में लगा हुआ है।  वह पूरी पृथ्वी पर साम्राज्य स्थापित करने की चेष्टा करता है। खगोल शास्त्र के इस सिद्धांत को हमारे ऋषियों ने बहुत गहराई से महसूस किया था उन्हें मालूम था कि एक न एक दिन  हमारी आकाशगंगा के साथ हमारा सूर्य और हमारी पृथ्वी भी नष्ट हो जाएंगी, और हम भी इसी अंतरिक्ष में समा जाएंगे।  इसलिए उन्होंने प्रकृति की पूजा एवं संरक्षण का ज्ञान दिया।  पृथ्वी पर पैदा होने वाले सभी जीव जंतुओं पशु पक्षियों के साथ मानव को सह- अस्तित्व जीवन का मंत्र दिया जिसमें इस पृथ्वी पर जो भी आया है अपने अलग-अलग जीवन के साथ वह अपना जीवन यापन करेगा यह उसका अधिकार है। मानव संपूर्ण पृथ्वी का उत्तराधिकारी नहीं है क्योंकि उसकी अपनी उम्र पार करने के बाद वह किस जीव की आत्मा में प्रवेश करेगा यह उसे मालूम नहीं है। यही कारण है कि पृथ्वी पर जीवन बाद में पैदा हुआ और उसके पहले भरण पोषण एवं जीवन को बचाए रखने के लिए प्रकृति ने पेड़ पौधे जीव जंतु एवं समस्त पर्याप्त संसाधन उपलब्ध करा दिए गए जो हमारी आवश्यकताओं के साथ-साथ अन्य जीव जंतुओं के जीवन के लिए उपयोगी है। प्रकृति ने आज की पीढ़ी के साथ आगामी पीढ़ी को भी जीवन जीने और विकास के लिए पर्याप्त संसाधन पृथ्वी पर उपलब्ध कराए हैं।

                              वैज्ञानिकों के अनुसार इस विशाल ब्रह्मांड के कन्या सुपर क्लस्टर में हमारी पृथ्वी स्थित है।  इसके मिल्की वे आकाशगंगा के अरबों तारों में से एक तारा हमारा सूर्य है।  इस सूर्य के गुरुत्वाकर्षण में बंधे कई ग्रहों के बीच लगभग 15 करोड़ किलोमीटर दूरी पर हमारी पृथ्वी स्थित है।  सूर्य से यह दूरी एवं तापमान जीवन के अनुरूप होने के कारण यहां जीवन संभव हो पाया जो सभी जीव जंतुओं के साथ-साथ पृथ्वी पर पैदा होने वाले पेड़ पौधों को जीवित रहने एवं बढ़ने की शक्ति प्रदान करता है।  इसलिए भारतीय अध्यात्म पृथ्वी पर सभी को समान अधिकार के साथ जीवन जीने का अधिकार देता है।

                               सहजीवन के अस्तित्व को स्वीकारते हुए आज विश्व के सभी देश समस्त जीव जंतुओं को बचाने का प्रयास कर रहे हैं।  विश्व में लुप्तप्राय प्रजाति के जीव को भी बचाने का प्रयास किया जा रहा है।  दुनिया के अलग-अलग हिस्से में पाए जाने वाले जीव जंतुओं के संरक्षण की जिम्मेदारी उस हिस्से में बसे देश की होती है। इसी का अनुसरण करते हुए दक्षिण एशिया के क्षेत्र में पाए जाने वाले जीवन में बाघ को बचाने का  प्रयास भारत एक लंबे समय से कर रहा है।  यही कारण है कि  वर्ष 1972 में वन्य जीव संरक्षण अधिनियम के तहत भारत सरकार द्वारा राज्यों को इन वन्य प्राणियों के संरक्षण हेतु अधिसूचित करने का अधिकार दिया गया।  राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण की सलाह पर यह अधिसूचना जारी की जाती है।  अब तक अन्य जीव जंतुओं के साथ भाग के संरक्षण हेतु कई राज्यों में उनके आवास संरक्षण तथा वृद्धि के लिए संरक्षित क्षेत्र घोषित किए गए हैं जिसमें आंध्र प्रदेश के नागार्जुन सागर श्रीशैलम असम का मानस टाइगर रिजर्व बड़े बाघ अभ्यारण है। छत्तीसगढ़ में बाघों के आवास के लिए पहले से तीन अभयारण्य बीजापुर जिले के इंद्रावती, गरियाबंद का उदंती सीता नदी और पेंड्रा गौरेला मरवाही जिले का अचानकमार बाघ अभयारण्य संचालित थे किंतु बाघों की बढ़ती संख्या एवं अन्य अभयारण्यों से जुड़ाव के कारण छत्तीसगढ़ में वर्ष 2024 में गुरु घासीदास तैमोर पिंगला बाघ अभयारण्य की घोषणा की गई जो अपनी विस्तृत सीमाओं के कारण भारतवर्ष का तीसरा सबसे बड़ा बाघ अभयारण्य कहलाया। 

                                   मध्य प्रदेश से छत्तीसगढ़ के विभाजन के बाद जैव विविधता से समृद्ध तीन बा अभ्यारण अस्तित्व में थे लेकिन मध्य प्रदेश के संजय दुबरी और बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व तथा झारखंड के पलामू रिजर्व जैसे पड़ोसी राज्यों के बाघों के आवागमन को ध्यान में रखते हुए पुराने गुरु घासीदास अभ्यारण एवं तैमूर पिंगला अभयारण्य को जोड़कर एक नए गलियारे को बाघों के आवागमन के लिए खोल दिया गया। केंद्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण ने अक्टूबर 2021 में अधिसूचना को स्वीकृति प्रदान की, जिसे बाद में 18 नवंबर 2024 को विधिवत 56 वें बाघ अभ्यारण क्षेत्र घोषित किया गया । छत्तीसगढ़ के मनेन्द्रगढ़ -चिरमिरी -भरतपुर  जिले से शुरू होकर यह अभयारण्य कोरिया , सूरजपुर,  एवं बलरामपुर जिले तक फैला हुआ है जिसमें कुल 2050 वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र बाघों का मुख्य आवास एवं 780 वर्ग किलोमीटर सुरक्षित बफर क्षेत्र घोषित किया गया है। सुरक्षित बफर क्षेत्र बाघों के आवागमन का वह स्थान होता है जहां बाघ अपने विचरण के लिए आ सकते हैं। यह अभयारण्य अपने पास के राज्यों में स्थित मध्य प्रदेश के बांधवगढ़ बाघ अभ्यारण एवं झारखंड के पलामू बाघ अभ्यारण से जुड़े होने के कारण बाघों के विचरण के लिए लगभग 4500 वर्ग किलोमीटर का विस्तृत गलियारा तैयार करता है।  इसी चुनाव के कारण यह अभयारण्य अब देश के महत्वपूर्ण बाघ अभ्यारण में शामिल है।

                                   गुरु घासीदास- तैमोर पिंगला बाघ  अभयारण्य पहले कोरिया जिले से प्रारंभ होता था लेकिन कोरिया जिले के विभाजन के बाद जनकपुर ,कमर्जी एवं कोटाडोल रेंज मनेन्द्रगढ़- चिरमिरी- भरतपुर नए जिले में शामिल हो गया। अपनी जैव विविधता के लिए पूरे देश में चर्चित इस क्षेत्र में 753 प्रजातियां पाई जाती हैं जिसमें 230 पक्षी एवं 55 स्तनपाई वन्य जीव की प्रजातियां शामिल है।  2005 के सर्वेक्षण गणना में यहां 04 बाघ,  45 तेंदुआ, 14 गौर ,110 चीतल, 250 कोटरी,   510 नीलगाय, लगभग 5000 लाल मुंह के बंदर, 1260 जंगली सूअर,  1250 शाही, 3000 काले मुंह के बंदर तथा कहीं-कहीं पैंगोलिन और नेवला के भी मिलने की जानकारी मिलती है। विगत 20 वर्षों में वन्य प्राणियों की संख्या में काफी परिवर्तन हुए हैं इसके अतिरिक्त हिरण। बिल्ली, बड़ी गिलहरी, सांभर, चौसिंघा, चिकारा,  लोमड़ी,  सियार, नेवला, लकड़बग्घा, खरगोश की बहुतायत संख्या का आवास यह अभ्यारण रहा है।  इसमें से कुछ की संख्या में वृद्धि हुई है वहीं वन्य  जीवों की संख्या भोजन तथा आवास की कमी के साथ-साथ हिंसक जानवरों के साथ साथ मानव और पशु के द्वंद्व की घटनाओं के कारण इनकी संख्या प्रभावित होती रही है।

                               पर्यावरण वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार वर्ष 2022 में देश में बाघों की संख्या से 10 से 15% वृद्धि की संभावना है उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 2022 तक 3682 भागों की संख्या थी जो 2027 में अंतिम रिपोर्ट आने के बाद आगे इनकी बढ़ोतरी की स्थिति स्पष्ट हो पाएगी।  बाघों के शिकार के लिए पर्याप्त संख्या में पशु नहीं होना भी बाघों के संरक्षण की चिंता में शामिल हो रहा है इसलिए कई अभ्यारण क्षेत्र में शिकार के अनुरूप हिरण, कोटरी, गौर, नीलगाय, जंगली सूअर , इस क्षेत्र में लाकर संरक्षित  करने और उनके विकास के लिए कार्य किए जाने की योजना की जानकारी इस बाग अभ्यारण के अधिकारियों से प्राप्त हुई है । बाघों के संरक्षण के लिए सुप्रीम कोर्ट ने भी कुछ गाइडलाइन जारी किए हैं जिसमें बाघों के निवास के कोर जोन में पर्यटकों की सफारी चलने पर प्रतिबंध शामिल है।  यह निर्णय पर्यटकों और बाघ अभ्यारण को प्रभावित कर सकता है लेकिन बफर जोन में यदि इसे संचालित किया जाए तब पर्यटक भी इसका आनंद ले पाएंगे और बाघों के संरक्षण भी प्रभावित नहीं होंगे।   

                                    कोरिया जिले में इस बाघ अभ्यारण्य की भौगोलिक सीमा उत्तर में आनंदपुर से दक्षिण मे  मेंड्रा ग्राम तक तथा पूर्व में जोगिया (सुखतरा) से पश्चिम में गरनई (चंदहा) ग्राम तक इसके 1440 वर्ग किलोमीटर भूभाग में फैला हुआ है। मनेन्द्रगढ़ -चिरमिरी- भरतपुर जिले के जनकपुर के चूल गांव से प्रारंभ होकर सूरजपुर जिले के सीमा में मोहली गांव तक यह विस्तार पाता है। गुरु घासीदास – तैमोर पिंगला अभ्यारण के उप संचालक एस बी  द्विवेदी एवं संचालक सौरभ सिंह ठाकुर से चर्चा में जानकारी मिली कि इस अभ्यारण में प्रवेश करने के लिए तीन मुख्य द्वार अधिकृत किए गए हैं जिसमें जनकपुर कोटा डोल मार्ग पर खिरकी ग्राम में, बैकुंठपुर सोनहत के मेंड्रा ग्राम में एवं बिहार पुर की ओर से मकरद्वारी प्रवेश द्वार खोले गए हैं, जहां पर्यटकों के अतिरिक्त अभ्यारण की सीमा से बाहर रहने वाले स्थानीय निवासी भी आना-जाना करते हैं। 

                            कोरिया एवं मने-चिर-भरतपूर  जिले के  क्षेत्र में जनकपुर से  सोनहत तक  विचरण करते बाघों में मास्टर टावर के पास आमापानी एवं भादा टावर के पास ज्यादातर बाघ देखे गए हैं।  विगत दिनों मादा बाघिन द्वारा दो शासको को जन्म देने का स्थान भी यही क्षेत्र था। वर्तमान में कोटाडोल , कमर्जी एवं जनकपुर रेंज मने-चिर-भरतपूर  जिले में आता है । सुरक्षा एवं संरक्षण के लिए किए जाने वाले उपायों की चर्चा में जानकारी मिली कि प्रवेश द्वार पर चार पहिया एवं दो पहिया वाहनों की संपूर्ण जानकारी पंजीबद्ध की जाती है।  इसका उद्देश्य आप जहां जा रहे हो उसकी संपूर्ण जानकारी  वन विभाग को होना आवश्यक है।  निर्धारित स्थल से इधर-उधर जाने को प्रतिबंधित किया जाता है। आपकी  गाड़ी की गति 30 किलोमीटर से अधिक नहीं होनी चाहिए ताकि रास्ते में विचरण करते वन्य जीव प्रभावित न हो। इसी तरह किसी भी आग्नेय अस्त्रों को   इस क्षेत्र में ले जाना प्रतिबंधित है। अपने पर्यटन के दौरान वन क्षेत्र में कहीं भी आगे बढ़ने से पहले वन विभाग से जानकारी जरूर ले लें।  जानकारी में पता चला कि अलग-अलग क्षेत्र में वन्य जीव अलग-अलग पाए जाते हैं जनकपुर क्षेत्र में नीलगाय, तेंदुआ, खरगोश, चीतल,जंगली मुर्गा,  जैसे वन्य जीव मिलते है जबकि सोनहत के जंगलों में जंगली सूअर  गौर,  कोटरी, भारतीय गिद्ध,  शाही, जंगली मुर्गा, सियार, काले और लाल मुंह के बंदर पाए जाते हैं।  

                 भविष्य में  पर्यटन को बढ़ावा देने की  जानकारी लेने पर बताया गया कि यहां पर बफर जोन में पर्यटकों के लिए अभयारण्य में वन विभाग द्वारा गाड़ियां चलाने पर विचार किया जा रहा है, जिसमें इस अभ्यारण की जैव विविधता, वनस्पतियों, नदियों, पर्वतमालाओं और वन्य जीव की जानकारी शामिल होगी। इसी तरह सोनहत के जंगलों में हिरण, कोटरी एवं नीलगाय की प्रजाति को लाकर संरक्षित किए जाने की योजना भी विचाराधीन है।  जो इस अभ्यारण के उज्जवल विकसित भविष्य का संकेत देती है। अब तक आने वाले पर्यटकों की संख्या पर उन्होंने बताया हिमालय क्षेत्र मैं ट्रैकिंग करने वाली ” इंडिया हाईक “कंपनी के द्वारा इस क्षेत्र को ट्रेकिंग के लिए चयनित किया गया है  जो अपनी टीम लेकर विगत   07 साल से यहां आ रही है। इनका टूर 8 से 10 दोनों का होता है जिसमें 10 किलोमीटर की यात्रा और पहाड़ियों की चढ़ाई शामिल होती है। अब तक लगभग 150 पर्यटक ट्रैकिंग के लिए आ चुके है।  उन्होंने बताया कि ट्रैकिंग का उद्देश्य नई पीढ़ी को जैव विविधताओं एवं वाइल्ड लाइफ से परिचित कराना होता है क्योंकि यही पीढ़ी आगे चलकर वन संरक्षण एवं जैव विविधता को आगे बढ़ाने में सहयोगी सिद्ध होगी। पर्यटकों की संख्या के संदर्भ में पर्यटकों की संख्या के संदर्भ में उन्होंने बताया कि लगभग चार से 5000 पर्यटक प्रति वर्ष यहां पहुंचते हैं लेकिन इसमें वह ग्रामवासी भी शामिल होते हैं जो अभ्यारण के उस पार बसे दूसरे गांव जाने के लिए आते हैं। 

                                                    गुरु घासीदास-  तैमोरपिंगला अभ्यारण जहां बाघों का नया आवास बन गया है वही बाघों की बढ़ती जनसंख्या के कारण उनके आवास अभी भी कम  पड़ रहे हैं। क्योंकि एक मादा बाघ को जहां 200 से लेकर 1000 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र की आवश्यकता होती है वही एक नर भाग को अपने शिकार एवं छिपने के लिए इससे दुगुने से लेकर 15 गुना  स्थान की जरूरत होती है, ताकि उन्हें उनका भोजन और आवास की स्वतंत्रता मिल सके। इस बाघ अभ्यारण में बाघ संरक्षण के साथ-साथ जैव विविधता के विभिन्न कारक नदी पहाड़ एवं सघन वनों की उपस्थिति इसे पर्यटकों के लिए विशिष्ट आकर्षक बनाती है। 

                             विंध्याचल एवं कैमूर पहाड़ियों की ऊंची नीची पहाड़ियों के बीच यहां का प्राकृतिक सौंदर्य अपने आंचल में विशाल साल वनों का फैलाव रखता है वहीं मिश्रित वनों की श्रृंखला के साथ-साथ विविध जड़ी बूटियां और लताओं का सौंदर्य प्रस्तुत करता है।  यहां की आकर्षक पहाड़ियों में बालमगढ़ी, खेखरा बोड़ा, माझी- गढ़, भैरवगढ़, गढ़पहाड़,  रेवला  चाटिया जैसी पहाड़ियों का सौंदर्य अपने आप में अनूठा है।  किसी विशाल नदी का उद्गम स्रोत देखने का सौंदर्य अलग होता है यहां पर बहती नदियों का उद्गम स्रोत उस बच्चे की तरह होता है जो अभी चलना सीख रहा हो, इस तरह की बाल लीलाएं और डगमग कदमों से चलती नदी में यहां हस्दो, गोपद,  बनास,पैरी, बीजाधुर, बेनिया, तीन झरिया, जैसी नदियों का उद्गम है हसदो सोनहत पहाड़ के पूर्व दिशा से निकलती है वहीं इसके पश्चिम में 10 किलोमीटर दूर गोपद नदी का उद्गम है जो अलग-अलग दिशाओं में बहती हुई अलग-अलग प्रवाह तंत्र को प्रस्तुत करती है। मिश्रित वनों में साल मुख्य रूप से यहां के सघन वनों में शामिल है, लेकिन इसके साथ चार -चिरौंजी, जामुन ,बरगद ,आंवला, पीपल, मैक्सी, हर्रा, बहेरा, तथा हृदय रोग का रामबाण वृक्ष अर्जुन और कल्लू के पेड़ बहुतायत में पाए जाते हैं । जी हां यह वही कुल्लू है जिसकी गोंद खाने के काम आती है और इसी से लड्डू बनाए जाते हैं।  साल वनों की गोंद धूप दीप में जलाने के काम आती है यह इतनी तीव्रता से जलता है कि चिता की अग्नि तेज करने के लिए पंडित अंत्येष्टि संस्कार की सामग्रियों में दो से चार किलो साल की गोंद जरूर लिखवा देते हैं।  हृदय रोग में उपयोग आने वाले अर्जुन के पेड़ इन्हीं नदियों के किनारे सैकड़ो की संख्या में मिलते हैं।  पानी के बहाव में इसके बीज इसके अंकुरण एवं विकास में सहायक होते हैं।

                                पृथ्वी के अलग-अलग हिस्सों में अपने अनुकूल जलवायु के अनुसार विभिन्न प्रकार के जीव जंतु विकसित होते हैं इसी तरह बाघ के आवासीय क्षेत्र उष्णकटिबंध, वर्षावन   सदाबहार वन, समशीतोष्ण मेग्रोव दलदल, घास के मैदान और सवाना जैसे स्थानों पर पाए जाते हैं।  यही कारण है कि दुनिया में बाघ भारत, नेपाल, भूटान, बांग्लादेश, म्यांमार, रूस,चीन, मलेशिया और इंडोनेशिया में  मिलते हैं।  प्राकृतिक बदलाव और आवास तथा भोजन की कमी के कारण कंबोडिया,लाओस और वियतनाम जैसे दक्षिण एशियाई देशों में अब बाग समाप्त हो गए हैं जो हमारी चिंता में शामिल होना चाहिए। इंटरनेशनल अंतरराष्ट्रीय बिग कैट एलाइंस  (IBCA)  जैसी वैश्विक संस्थाएं इनका संरक्षण करने के लिए विभिन्न अभियान चलाकर इन्हें बचाने का प्रयास करती रहती है जो सह- अस्तित्व जीवन के क्षेत्र में एक सशक्त कदम माना जा सकता है। 

                                वर्तमान भारत में बाघों की सबसे बड़ी संख्या होना भारत की जागरूकता का परिणाम है जो विश्व बाघ संरक्षण में भारत को विशेष दर्जा प्रदान करता है।  2022 में भारत में बाघों की संख्या 3167 थी जो 2027 में बढ़कर  3682  होने की संभावना है यह आंकड़े केवल एक वन्य प्राणी के संरक्षण की नहीं बल्कि

सह- अस्तित्व के साथ प्रकृति में जीने की भारतीय संस्कृति और दर्शन को आगे बढ़ाती है। 

                           गुरु घासीदास- तैमूर पिंगला बाघ अभ्यारण की जंगलों के बीच पहाड़ों और गुफाओं में आदिमानव के आवास की जानकारी भी मिलती है।  यहां पर पहाड़ों की गुफाओं में 4000 से लेकर 5000 साल तक के पुराने भित्ति चित्रों का मिलना  इसे प्रमाणित करता है।  जनकपुर वन क्षेत्र में कोहबउर (भंवरखोह) तथा मितौली गढ़ पहाड़ (घोड़ासर) , सहित देवगढ़ की पहाड़ियों में कई भित्ती चित्र पाए गए है  इसमें बैल, हिरण  मानव आकृतियां,हाथ के पंजे का निशान, स्वास्तिक जैसे चिन्ह शामिल है।  यह भित्ति चित्र इतिहासकारों एवं भूगर्भ शास्त्रियों के खोज एवं प्रमाण की जरूरत को भी आमंत्रित करते हैं। इसी तरह जोगीमाड़ा, सीता बेंगरा  कैलाश- गुफा, डीपाडीह में मिलने वाले चित्र लिपि के भित्ति चित्र भी प्रागैतिहासिक काल की जीवन शैली कला और उनके चित्रांकन के साथ-साथ उसे काल गणना के कई अनसुलझे प्रश्न हमारे सामने प्रस्तुत करता है, जिस पर खोज के साथ-साथ प्रमाणीकरण के कार्य अभी शेष है जो हमारी नई पीढ़ी के खोजी वैज्ञानिकों के लिए चुनौती रहेगी।

                                     वनवासी भगवान राम के वन गमन के समय काल की यादों को समेटे सीतामढ़ी हरचौका,  घाघरा सीतामढ़ी, और कोटाडोल  में छतौड़ा आश्रम , देवगढ़ एवं रामगढ़ की पहाड़ियों पर उनके पदचिन्हो की आस्था आज भी अंचल में निवासरत आदिवासियों के तीज- त्यौहार के गीतों, सांस्कृतिक परंपराओं में रची बसी है।  जो आध्यात्मिक पन्नों में वर्णित त्रेता युग  की कहानियां और घटनाओं से यह अंचल स्वयं को पहाड़ों जंगलों और प्रकृति से जोड़ती है । वनवासी राम का चरित्र जंगलों पहाड़ों से गुजरते हुए इन्हीं बंदरों भालुओं की सेना तैयार करने और  अन्याय  तथा अत्याचार के विरुद्ध जीत दर्ज करने का इतिहास रचा है। इतिहास की यह घटनाएं 

सह-अस्तित्व जीवन और प्रकृति संरक्षण का बहुत महत्वपूर्ण उदाहरण है।  वर्तमान समय के पन्नों पर यह आज हमारी धरोहर है जो हमें आगे भी इसी संस्कृति को बचाए रखने और आगे बढ़ाने हेतु प्रोत्साहित करती रहेगी।  समय की आवाज को महसूस करने और प्रकृति संरक्षण को बनाए रखने में मानव को यथासंभव प्रयास करना उसकी जिम्मेदारी है, और इसके प्रति संकल्पित होकर कार्य करना आज की आवश्यकता है। हमें यह ध्यान रखना होगा कि इस विशाल  अंतहीन ब्रह्मांड में मात्र पृथ्वी पर आज जीवन है।  इस पृथ्वी के चारों ओर अंतरिक्ष का निर्वाण शून्य है जो हमें कब अपने बाहुपाश में बांधकर स्वयं में शामिल कर लेगा यह हमें मालूम नहीं। इसलिए विस्तृत मस्तिष्क के स्वामी होने के कारण मानव को अपना जीवन बचाए रखने के लिए सह अस्तित्व जीवन के प्रति सचेत रहना होगा। सहस्तित्व-  जीवन का सिद्धांत ही मानव को धरती पर लंबे समय तक बचाए रख सकता है।

बस इतना ही 

फिर मिलेंगे किसी अगले पड़ाव पर  

बीरेन्द्र कुमार श्रीवास्तव 

मनेंद्रगढ़, छत्तीसगढ़ 497442 

संपर्क फोन 942558 1356

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