“धरमजयगढ़ में शिक्षा के नाम पर करोड़ों की बारिश, फिर भी स्कूलों में क्यों टपक रही अव्यवस्थायें?”
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धरमजयगढ़ – समग्र शिक्षा छत्तीसगढ़ के अंतर्गत शैक्षणिक सत्र 2025-26 के लिए राज्य को करोडों रुपये की भारी-भरकम वित्तीय स्वीकृति दी गई है। इस राशि का उद्देश्य विद्यालयों के रखरखाव, शिक्षण गुणवत्ता में सुधार और बच्चों के लिए बेहतर सीखने का माहौल तैयार करना बताया जा रहा है, लेकिन धरमजयगढ़ क्षेत्र के संदर्भ में यही स्वीकृति अब कई सवाल खड़े कर रही है।

राज्य परियोजना कार्यालय के आदेश के अनुसार प्रत्येक संकुल केंद्र को मेंटेनेंस, मीटिंग टीए और कंटिजेंसी मद में निर्धारित राशि मिलनी है। रायगढ़ जिले के लिए भी करोड़ों रुपये का प्रावधान किया गया है, जिसमें धरमजयगढ़ विकासखंड के संकुल केंद्र स्वाभाविक रूप से शामिल हैं। प्रश्न यह है कि कागजों में स्वीकृत यह राशि वास्तव में धरमजयगढ़ की शालाओं तक कितनी और कैसे पहुँच रही है।

विद्यालयों की जमीनी स्थिति पर नजर डालें तो कई शालाओं में आज भी भवन मरम्मत, शौचालय की साफ-सफाई, पेयजल, हैंडवॉश व्यवस्था और बुनियादी शिक्षण संसाधनों की कमी देखी जाती है। ऐसे में सवाल उठता है कि हर साल स्वीकृत होने वाली मेंटेनेंस और कंटिजेंसी ग्रांट का उपयोग आखिर किस मद में और कहाँ किया जा रहा है। यदि राशि का सही उपयोग हुआ होता तो क्या आज भी कई स्कूल जर्जर भवनों और सीमित संसाधनों के सहारे संचालित होते।
दिशा-निर्देशों में स्पष्ट है कि अनुदान राशि के व्यय से पहले शाला प्रबंधन समिति की बैठक, अनुमोदन और सामाजिक अंकेक्षण अनिवार्य है। लेकिन धरमजयगढ़ में कितनी शालाओं में वास्तव में यह प्रक्रिया ईमानदारी से अपनाई जा रही है, यह अपने आप में एक बड़ा सवाल है। क्या सूचना पटल पर अनुदान और व्यय का विवरण सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित किया जा रहा है या फिर यह जानकारी फाइलों और रजिस्टरों तक ही सीमित है।
स्वच्छता एक्शन प्लान के तहत अनुदान राशि का कम से कम 10 प्रतिशत हिस्सा शौचालय, पानी और हैंडवॉश जैसी सुविधाओं पर खर्च किया जाना है। इसके बावजूद कई स्कूलों में शौचालय या तो बंद पड़े हैं या उपयोग लायक नहीं हैं। क्या स्वच्छता के नाम पर दिखाई जाने वाली तस्वीरें सिर्फ निरीक्षण के दिन तक सीमित रहती हैं, और उसके बाद व्यवस्था फिर पुराने हाल में लौट आती है।
शिक्षा विभाग का दावा है कि अनुदान राशि का उपयोग बच्चों के लिए सीखने का अनुकूल वातावरण बनाने में किया जा रहा है। लेकिन धरमजयगढ़ के कई विद्यालयों में आज भी न तो लर्निंग कॉर्नर दिखाई देते हैं और न ही पुस्तकालयों में नई पुस्तकें। सवाल यह है कि क्या करोड़ों की यह राशि वास्तव में बच्चों तक पहुँच रही है या फिर वह कागजी प्रगति रिपोर्टों में ही सिमट कर रह जाती है।
अब जब समग्र शिक्षा के तहत एक बार फिर बड़े पैमाने पर राशि स्वीकृत की गई है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक कि पिछले वर्षों में मिली राशि का वास्तविक लेखा-जोखा क्या है। क्या कभी स्वतंत्र और प्रभावी सामाजिक अंकेक्षण हुआ है, और यदि हुआ है तो उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं है।
अब यह सवाल लगातार गहराता जा रहा है कि शिक्षा के नाम पर स्वीकृत करोड़ों रुपये आखिर किसके लिए और किसके हित में खर्च हो रहे हैं। जब तक इन सवालों के जवाब जमीन पर दिखाई नहीं देंगे, तब तक हर नई स्वीकृति एक उपलब्धि से अधिक एक नई शंका बनकर सामने आती रहेगी।
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