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नियमों की धज्जियाँ उड़ती रहीं ,  जिम्मेदार बने रहे अनजान !

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“नाम बदला नियम वही , क्या बदलेगी कार्यप्रणाली”


धरमजयगढ़ जनपद पंचायत के अंतर्गत कई ग्राम पंचायतों में ग्रामीण रोजगार योजना के क्रियान्वयन को लेकर गंभीर सवाल उठने लगे हैं हाल ही में योजना का नाम बदला गया है लेकिन इसके संचालन से जुड़े नियम और दिशा निर्देश लगभग यथावत हैं इसके बावजूद जमीनी स्तर पर कार्यप्रणाली में बदलाव के संकेत नजर नहीं आ रहे हैं जिससे यह आशंका गहराती जा रही है कि नाम परिवर्तन केवल औपचारिकता बनकर न रह जाये!
योजना के नियम स्पष्ट रूप से यह तय करते हैं कि कार्यों में मजदूरी को प्राथमिकता दी जाएगी और सामग्री पर होने वाला व्यय सीमित रखा जाएगा ताकि अधिक से अधिक ग्रामीणों को रोजगार मिल सके लेकिन धरमजयगढ़ क्षेत्र की कई पंचायतों में इसके विपरीत स्थिति सामने आ रही है जहां मजदूरी की तुलना में सामग्री खरीदी पर अधिक ध्यान दिया गया और नियमों की खुलेआम अनदेखी की गई !
दिशा निर्देशों के अनुसार सामग्री की खरीदी आवश्यकता आधारित और पारदर्शी होनी चाहिए साथ ही मजदूरों को समय पर मजदूरी भुगतान सुनिश्चित करना अनिवार्य है लेकिन क्षेत्र में मजदूरी लंबित रहने और सामग्री भुगतान पहले किए जाने की शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं इससे यह सवाल उठ रहा है कि जब नियम नहीं बदले तो कार्यप्रणाली में यह ढील क्यों दिखाई दे रही है !
योजना के संचालन की जिम्मेदारी जिन अधिकारियों पर है उनके द्वारा प्रभावी निगरानी नहीं किए जाने के आरोप भी लग रहे हैं कई मामलों में नियमों की धज्जियाँ उड़ती रहीं और अधिकारी अनजान बने रहे या अनजान बने रहने की भूमिका में दिखाई दिए इससे प्रशासनिक जवाबदेही पर गंभीर प्रश्न खड़े हो रहे हैं
योजना के नाम परिवर्तन के साथ यह अपेक्षा की जा रही थी कि पारदर्शिता जवाबदेही और निगरानी तंत्र को और मजबूत किया जाएगा लेकिन धरमजयगढ़ जनपद में सामने आ रही स्थिति से ऐसा नहीं लगता अब ग्रामीणों और जनप्रतिनिधियों द्वारा यह मांग उठने लगी है कि जब नियम वही हैं तो कार्यप्रणाली में सुधार कब होगा और क्या नाम बदलने से ही योजना का उद्देश्य पूरा हो जाएगा !
यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि प्रशासन इन सवालों को कितनी गंभीरता से लेता है और क्या योजना के मूल उद्देश्य के अनुरूप कार्यप्रणाली में ठोस बदलाव किए जाते हैं या फिर ग्रामीणों के अधिकार यूं ही कागजों तक सीमित रह जाएंगे !
धरमजयगढ़ जनपद पंचायत के अंतर्गत संचालित ग्रामीण रोजगार योजना को लेकर हालात चिंताजनक रहे हैं योजना का उद्देश्य गांवों में रोजगार उपलब्ध कराना और टिकाऊ परिसंपत्तियों का निर्माण करना है लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि कई ग्राम पंचायतों में काम अब धरातल पर कम और कागजों पर ज्यादा दिखाई दे रहा है कार्यों की तस्वीरें अभिलेखों में पूरी नजर आती हैं लेकिन वास्तविक स्थल पर जाकर देखने पर स्थिति बिल्कुल विपरीत पाई जा रही है !
नियम स्पष्ट रूप से कहते हैं कि यह योजना मजदूर प्रधान है और अधिकांश खर्च मजदूरी पर किया जाना चाहिए ताकि ग्रामीणों को रोजगार मिले इसके बावजूद कई पंचायतों में कार्य ऐसे दर्शाए गए जिनमें सामग्री पर अधिक खर्च दिखाया गया और मजदूरी सीमित कर दी गई इससे यह संदेह गहराता जा रहा है कि कहीं योजना को केवल भुगतान निकालने का माध्यम तो नहीं बना दिया गया !

यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि प्रशासन इन सवालों को कितनी गंभीरता से लेता है और क्या योजना के मूल उद्देश्य के अनुरूप कार्यप्रणाली में ठोस बदलाव किए जाते हैं या फिर ग्रामीणों के अधिकार यूं ही कागजों तक सीमित रह जाएंगे

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