October 5, 2026

Udghosh Samay News

खबर जहां हम वहां

केंद्रीय दावों की रफ्तार तेज, पर स्थानीय दफ्तरों में रिकॉर्ड तक नहीं ! कागजी पहेली बना शेरबंद कोल ब्लॉक

1 min read
Spread the love

​धरमजयगढ़ – छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले के धरमजयगढ़ क्षेत्र में स्थित शेरबंद कोल ब्लॉक को लेकर एक ऐसा प्रशासनिक और विधिक रहस्य गहरा गया है, जो कागजी दावों और जमीनी हकीकत के बीच की पोल खोल रहा है। केंद्रीय दस्तावेजों में इस परियोजना के विकास और अन्वेषण कार्य तेजी से आगे बढ़ने के दावे किए जा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ राज्य स्तर के प्रमुख नोडल दफ्तरों में इस खदान से जुड़ा कोई रिकॉर्ड ही मौजूद नहीं है। इस स्थिति ने सबसे बड़ा सवाल यह खड़ा कर दिया है कि आखिर बिना स्थानीय दस्तावेजों और वैधानिक जानकारियों के धरातल पर प्रक्रियाएं कैसे आगे बढ़ रही हैं।


​केंद्रीय दावों और स्थानीय हकीकत का विरोधाभास
​मांड-रायगढ़ कोयला क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले इस ब्लॉक को लेकर केंद्र सरकार के स्तर पर लगातार प्रगति दर्शाई जाती रही है। पिछले वर्षों में जारी समीक्षा रिपोर्टों और आधिकारिक दस्तावेजों के हवाले से यह बताया गया था कि इस ब्लॉक के लिए प्रॉस्पेक्टिंग लाइसेंस और माइनिंग लीज की प्रक्रिया आगे बढ़ चुकी है तथा वन क्षेत्र के भीतर ड्रिलिंग कार्य के लिए भी औपचारिकताएं पूरी हो चुकी हैं। इसके आधार पर यह माना जा रहा था कि परियोजना निर्धारित समयसीमा की ओर बढ़ रही है।
​लेकिन इस पूरे दावों की पोल तब खुल गई जब राज्य के एक आधिकारिक आदेश ने यह उजागर किया कि संबंधित वनमंडल कार्यालय के पास इस खदान से जुड़े बुनियादी दस्तावेज, जैसे खनन पट्टा स्वीकृत और निष्पादित होने की जानकारी या स्वीकृत खनन योजना तक उपलब्ध नहीं है।


​बड़ा सवाल: क्या बिना रिकॉर्ड और अनुमति के चल रहा है खेल?
​यह स्थिति बेहद गंभीर और चौंकाने वाली है। जब खदान क्षेत्र से जुड़े प्रमुख वैधानिक और प्रशासनिक कार्यालय के पास ही परियोजना से संबंधित लीज, पट्टे या खनन योजना का कोई रिकॉर्ड दर्ज नहीं है, तो यह सवाल उठना लाजमी है कि केंद्रीय दस्तावेजों में जिन गतिविधियों और ड्रिलिंग का उल्लेख किया जा रहा है, वे किस आधार पर हो रही हैं। क्या केंद्र और राज्य के विभागों के बीच समन्वय का ऐसा भारी अभाव है कि स्थानीय अमले को अपने ही क्षेत्र की बड़ी कोयला परियोजनाओं की कोई आधिकारिक जानकारी नहीं है?
​जानकारों का मानना है कि यदि वन विभाग और स्थानीय दफ्तरों के पास लीज और खनन योजना के दस्तावेज उपलब्ध ही नहीं हैं, तो इसे कागजों पर चल रही प्रक्रिया और धरातल पर प्रशासनिक पारदर्शिता के बीच एक बड़ी खाई माना जाना चाहिए।
​अन्वेषण और मंजूरियों का उलझा हुआ जाल
​शेरबंद कोल ब्लॉक की फाइल शुरुआत से ही पेचीदगियों में फंसी रही है। डीजीपीएस सर्वे के बाद इस क्षेत्र में वनभूमि का दायरा काफी बढ़ जाने के कारण प्रशासनिक सत्यापन की प्रक्रिया लंबी खिंच गई। इसके अलावा, भू-वैज्ञानिक रिपोर्ट के अंतिम अनुमोदन को लेकर भी स्थिति पूरी तरह धुंधली है। पर्यावरणीय लिहाज से यह क्षेत्र लेमरू एलीफेंट रिजर्व की सीमा के बेहद करीब स्थित है, जिससे भविष्य में मिलने वाली वन और पर्यावरण स्वीकृतियों की राह पहले से ही अत्यंत जटिल बनी हुई है।
​
​शेरबंद कोल ब्लॉक की यह पूरी दास्तान यह साबित करने के लिए काफी है कि कागजों पर विकास की रफ्तार भले ही तेज दिखाई जा रही हो, लेकिन जमीनी स्तर पर यह परियोजना समन्वय की कमी, दस्तावेजों के ना होने और प्रशासनिक तंत्र के बीच रहस्य के घेरे में सिमट कर रह गई है। जब तक विभागों के बीच तालमेल और दस्तावेजों की स्थिति स्पष्ट नहीं होती, तब तक इस खदान को केवल एक कागजी पहेली ही कहा जाएगा।

About The Author

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

[join_button]
WhatsApp